लखनऊ : नवाबों की नगरी और उसकी गलियों में इन दिनों सिर्फ ट्रैफिक और भीड़ का शोर नहीं है। कई मोहल्लों में कुत्तों के झुंड भी शहर की रोजमर्रा की तस्वीर का हिस्सा हैं। अब पशु गणना का नया आंकड़ा इस तस्वीर को एक संख्या दे रहा है। एक आंकड़ा कहता है कि राजधानी में 86 हजार 195 आवारा कुत्ते हैं। 2019 में यह संख्या 75 हजार 678 थी। पहली नजर में आंकड़ा बढ़ता दिखता है, लेकिन नगर निगम की महापौर के मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह शहर की सीमा का विस्तार है। इस बार नगर निगम में शामिल नए इलाकों को भी गणना में शामिल किया गया है। पुराने नगर निगम क्षेत्र में 66 हजार 405 और नए क्षेत्रों में 19 हजार 790 कुत्ते मिले हैं। नए इलाकों में नसबंदी का कवरेज भी पुराने शहर की तुलना में कम है। महापौर का कहना है कि नसबंदी अभियान ने कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद की है।
नवाबों की नगरी में कुत्तों का शोर
नगर निगम के मुताबिक 2019 से अब तक करीब एक लाख कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है। करीब 23 हजार की नसबंदी अभी बाकी बताई जा रही है।लेकिन कागज पर दर्ज संख्या और सड़क पर महसूस होने वाला डर, दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते।
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आंकड़े और सवाल
कुत्तों की संख्या कितनी है, यह प्रशासन के लिए जरूरी आंकड़ा है। लेकिन आम नागरिक के लिए सवाल इससे आगे है। स्कूल जाता बच्चा सुरक्षित है या नहीं। सुबह टहलने निकला बुजुर्ग बेखौफ है या नहीं। रात में घर लौटता राहगीर सड़क पर झुंड देखकर रास्ता बदलने को मजबूर तो नहीं।लखनऊ में पिछले महीनों में कुत्तों के हमले की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। एक सात साल की बच्ची की मौत का मामला सामने आया था। चिनहट में पांच साल की बच्ची पर हमला हुआ। विधायक निवास परिसर में 12 वर्षीय बच्चे को कुत्ते ने काट लिया। राजधानी से बाहर भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। मुरादाबाद, गोंडा, सहारनपुर और बदायूं में कुत्तों के हमलों से बच्चों की मौत या गंभीर रूप से घायल होने की घटनाएं सामने आई हैं। हर मामले की परिस्थितियां अलग रही हैं, इसलिए उन्हें एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा, लेकिन ये घटनाएं आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर चिंता जरूर बढ़ाती हैं।
नसबंदी से आगे अब बाड़ों की तैयारी
नगर निगम अब नसबंदी अभियान के साथ एक और व्यवस्था पर काम कर रहा है। महापौर के मुताबिक आवारा कुत्तों के लिए बाड़े बनाए जाएंगे और अमौसी में इसका काम शुरू हो चुका है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नसबंदी आबादी नियंत्रित करने का उपाय है, तत्काल सुरक्षा व्यवस्था नहीं। बीमार, घायल या आक्रामक कुत्तों की पहचान और उनके लिए अलग प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है। साथ ही कूड़ा प्रबंधन पर नियंत्रण भी इस समस्या का अहम हिस्सा है। जहां खुले में भोजन और कचरा उपलब्ध रहेगा, वहां आवारा कुत्तों का जमावड़ा भी बना रहेगा।
शहर बढ़ा, जिम्मेदारी भी बढ़ी
86 हजार का आंकड़ा इसलिए बड़ा है क्योंकि लखनऊ अब पहले वाला लखनऊ नहीं रहा। शहर की सीमाएं बढ़ी हैं, आबादी बढ़ी है और नए इलाके नगर निगम का हिस्सा बने हैं। इस विस्तार के साथ नगर निगम की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। नसबंदी हो, टीकाकरण हो, कूड़ा प्रबंधन हो या बाड़ों की व्यवस्था, इन सभी को एक साथ चलाना होगा। क्योंकि यह सिर्फ पशु नियंत्रण की समस्या नहीं है। यह मानवीय सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। कुत्ते भी शहर का हिस्सा हैं, लेकिन सड़क किसी झुंड की जागीर नहीं हो सकती। लखनऊ के लिए असली सफलता तब होगी जब नसबंदी का आंकड़ा भी सुधरे, पशुओं के लिए सुरक्षित व्यवस्था भी बने और सड़कों पर चलते बच्चों के कदमों से डर गायब हो। 86 हजार कुत्तों की गिनती हो चुकी है। अब बारी उस व्यवस्था की है जो तय करे कि इस शहर में इंसान और पशु दोनों सुरक्षित रह सकें।
