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कर्ज के समंदर में डूबी दुनिया! भारत कितना बड़ा कर्जदार और आपकी जेब पर क्या असर?

दुनिया पर बढ़ते कर्ज का बोझ अब सिर्फ सरकारी खजाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका लोगों की जिंदगी पर भी पड़ रहा है। कुछ सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा से ज्यादा पैसा ब्याज चुकाने पर खर्च कर रही हैं।

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वैश्विक कर्ज संकट
Authored by: आलोक कुमार
Updated Oct 22, 2026, 13:48 IST
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दुनियाभर के देशों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें हैं। सभी सरकारें दावा करती हैं कि वे जनता की बेहतरी के लिए काम कर रही हैं। इसके लिए वे कल्याणकारी योजनाओं से लेकर कई तरह की सुविधाएं और सब्सिडी देती हैं। जनता को राहत मिलती है तो लगता है कि सरकार उनके हित में काम कर रही है।

लेकिन, इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। जनता को मुफ्त सुविधाएं और सब्सिडी देने के लिए सरकारें बड़े पैमाने पर खर्च कर रही हैं। कई देशों में बढ़ते सरकारी खर्च और कर्ज का बोझ चिंता का विषय बन गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया पर कुल कर्ज करीब 365 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 34,580 लाख करोड़) पहुंच गया है। बढ़ते कर्ज और उस पर चुकाए जाने वाले ब्याज का असर महंगाई, सरकारी खर्च और आम लोगों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। आइए समझते हैं कि दुनिया पर बढ़ता कर्ज कैसे आम नागरिकों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है और इस मामले में भारत की स्थिति क्या है।

भारी कर्ज कैसे बढ़ा रहा बोझ

इसको फ्रांस के उदाहरण से समझते हैं। हाल के हफ्तों में, यूरोप भर में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। वे बढ़ती महंगाई, कम वेतन, महंगे आवास और स्कूलों के लिए अपर्याप्त फंड को लेकर नाराज हैं। दरअसल, भारी कर्ज पर ब्याज चुकाने में सरकारों के राजस्व का बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है। ब्याज भुगतान पर जितना अधिक पैसा खर्च होता है, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेंशन जैसी जरूरी सेवाओं के लिए उतना ही कम बजट बचता है।

सरकारें पैसे कैसे उधार लेती हैं?

सरकारें भी आम लोगों की तरह ही पैसे उधार लेती हैं, लेकिन बैंक के पास जाने के बजाय, वे बॉन्ड बेचती हैं। इसके बदले में, सरकार खरीदारों को ब्याज देती है और एक तय तारीख पर पूरी रकम वापस करने का वादा करती है। 10 साल का बॉन्ड एक ऐसा लोन है जिसे सरकार एक दशक (10 साल) के बाद चुकाती है। इसकी 'यील्ड' (यानी पैसा उधार देने पर निवेशकों को मिलने वाला रिटर्न) इस बात का सबसे अहम पैमाना है कि बाजार को किसी देश पर अपने कर्ज को संभालने के लिए कितना भरोसा है।

यह इस तरह काम करता है:

10-वर्षीय बॉन्ड सरकार को दिया गया एक कर्ज (ऋण) होता है। इसमें सरकार 10 वर्षों तक निवेशकों को ब्याज देती है और अवधि पूरी होने पर मूल राशि वापस लौटा देती है।

1. सरकार पैसा उधार लेती है

- सरकार निवेशकों को 10-वर्षीय बॉन्ड बेचकर ₹10,000 जुटाती है।

- मान लेते हैं कि कोई एक निवेशक सरकार को ₹10,000 उधार देता है।

2. सरकार ब्याज का भुगतान करती है

- 10 वर्षों तक सरकार हर साल निवेशक को ब्याज देती है।

- बॉन्ड की ब्याज दर और बाजार में उससे मिलने वाले रिटर्न को समझने के लिए यिल्ड (Yield) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।

जिन सरकारों को कर्ज देने में ज्यादा जोखिम माना जाता है, उन्हें आमतौर पर ज्यादा ब्याज देना पड़ता है।

- 2.5% की दर पर: सरकार हर साल ₹250 का भुगतान करती है। 10 वर्षों में कुल ब्याज ₹2,500 होगा।

- 5% की दर पर: सरकार हर साल ₹500 का भुगतान करती है। 10 वर्षों में कुल ब्याज ₹5,000 होगा।

3. सरकार कर्ज चुकाती है

- 10 साल बाद सरकार निवेशक को मूल ₹10,000 वापस लौटा देती है।

- इस तरह निवेशक को मूल रकम के अलावा 10 वर्षों में मिला ब्याज भी प्राप्त होता है।

जब उधार लेना महंगा हो जाता है तो क्या होता है?

जब बॉन्ड की कीमतें गिरती हैं, तो यील्ड (प्रतिफल) बढ़ जाती है, जिससे उधार लेना महंगा हो जाता है। जैसे किसी परिवार को अधिक मॉर्गेज दर (होम लोन की ब्याज दर) का सामना करना पड़ता है, वैसे ही सरकार को भी ब्याज पर अधिक खर्च करना पड़ता है। इससे स्कूलों, अस्पतालों और सड़कों जैसी जरूरी चीजों के लिए सरकार के पास कम पैसा बचता है।

आज फ्रांस को 10 साल के लिए कर्ज लेने पर लगभग 5 प्रतिशत ब्याज देना पड़ रहा है, जबकि जर्मनी के लिए यह दर 3.41 प्रतिशत है। यह बढ़ता हुआ अंतर दिखाता है कि निवेशक फ्रांस को कर्ज देने के बदले अधिक रिटर्न चाहते हैं।

किन देशों पर सबसे ज्यादा कर्ज है?

अमेरिका पर सबसे ज्यादा सरकारी कर्ज है, जो 41.4 ट्रिलियन डॉलर है। यह उसकी अर्थव्यवस्था या सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 127 प्रतिशत है। अमेरिका को डॉलर में उधार लेने का फायदा मिलता है, क्योंकि डॉलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है, जिससे इसके कर्ज की वैश्विक मांग बनी रहती है। लेकिन, इसके उधार लेने की क्षमता असीमित नहीं है।

इसके बाद चीन का नंबर आता है, जिस पर 22.5 ट्रिलियन डॉलर (GDP का 104 प्रतिशत) का कर्ज है। वहीं, जापान पर 8.7 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा, यह उसकी GDP का 199 प्रतिशत है। ब्रिटेन पर 4.4 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है, जो उसकी GDP का 102 प्रतिशत है।

फ्रांस दुनिया में पांचवें स्थान पर है, जिस पर 4.2 ट्रिलियन डॉलर (GDP का 118.5 प्रतिशत) का कर्ज है। यह इटली के 3.7 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज़ से ज़्यादा है, हालांकि अपनी अर्थव्यवस्था के अनुपात में इटली का कर्ज़ 138 प्रतिशत है, जो कि अधिक है। जर्मनी पर 3.5 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है, जो उसकी GDP का केवल 65 प्रतिशत है।

दुनिया के टॉप-10 कर्जदार देश

क्र.सं.देश/क्षेत्रकुल कर्जकर्ज का रुझान (2010–2026)कर्ज (जीडीपी का %)
1अमेरिका$41.4 ट्रिलियन$14.4T → $41.4T127%
2चीन$22.5 ट्रिलियन$2T → $22.5T104%
3जापान$8.7 ट्रिलियन$10.4T → $8.7T199%
4ब्रिटेन$4.4 ट्रिलियन$1.9T → $4.4T102%
5फ्रांस$4.2 ट्रिलियन$2.3T → $4.2T118%
6इटली$3.7 ट्रिलियन$2.5T → $3.7T138%
7जर्मनी$3.5 ट्रिलियन$2.8T → $3.5T65%
8भारत$3.4 ट्रिलियन$1.1T → $3.4T83%
9कनाडा$2.9 ट्रिलियन$1.4T → $2.9T116%
10ब्राजील$2.6 ट्रिलियन$1.4T → $2.6T97%
स्रोत: IMF

हर शख्स पर ₹41 लाख की देनदारी

इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (IIF) के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में सरकारों, परिवारों और कंपनियों सहित वैश्विक कर्ज 10 ट्रिलियन डॉलर बढ़कर 365 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया। यह पृथ्वी पर मौजूद हर व्यक्ति के हिस्से में लगभग 44,000 डॉलर (41,70,743 रुपये) के बराबर है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने पिछले साल अपने सरकारी बॉन्ड पर ब्याज के रूप में 3.3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का भुगतान किया।

ग्लोबल डेट क्राइसिस

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बढ़ता कर्ज क्यों बना बड़ा संकट?

सरकारें अपने खर्चों को पूरा करने, अपने नागरिकों की सुरक्षा करने और उनमें निवेश करने, तथा एक बेहतर भविष्य की राह तैयार करने के लिए कर्ज का उपयोग करती हैं। हालांकि, जब कर्ज चुकाने की लागत बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो यह अन्य खर्चों के लिए जगह नहीं छोड़ती, विकास की गति को रोक देती है और लोगों के भविष्य को खतरे में डाल देती है। आज कई विकासशील देश इसी वास्तविकता का सामना कर रहे हैं।

कर्ज बढ़ने से आप पर क्या असर?

आम जनता के लिए, ब्याज का बढ़ता खर्च मतलब स्कूलों, अस्पतालों और पेंशन जैसी सुविधाओं के लिए कम पैसा बचना। इस खर्च को पूरा करने के लिए सरकारों को टैक्स बढ़ाना या खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। सरकार के लिए कर्ज लेना महंगा होने से मॉर्गेज (होम लोन), कार लोन और क्रेडिट कार्ड पर भी ब्याज दरें बढ़ती हैं। यानी कर्ज बढ़ने से महंगाई से लेकर ईएमआई का बोझ बढ़ सकता है।

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