एक ही सैलरी पर एक को ज्यादा तो दूसरे को कम लोन क्यों?

समान सैलरी होने के बावजूद दो अलग-अलग व्यक्तियों की लोन एलिजिबिलिटी (Loan Eligibility) अलग-अलग हो सकती है। जानिए बैंक किन महत्वपूर्ण कारकों के आधार पर तय करते हैं कि किसे कितना लोन मिलेगा और किसका आवेदन खारिज हो सकता है।

अक्सर देखा जाता है कि जब दो व्यक्ति, जिनकी मासिक सैलरी (Monthly Salary) बिल्कुल एक समान है, एक ही बैंक में पर्सनल या होम लोन के लिए आवेदन करते हैं, तो उन्हें मिलने वाली लोन राशि या ब्याज दरों में बड़ा अंतर होता है। कई बार एक व्यक्ति को आसानी से मनमुताबिक लोन मिल जाता है, जबकि दूसरे का आवेदन या तो खारिज कर दिया जाता है या उसे बहुत कम रकम का लोन ऑफर किया जाता है। आम लोगों को यह प्रक्रिया असमान लग सकती है, लेकिन बैंक लोन देने का फैसला केवल आपकी सैलरी देखकर नहीं, बल्कि कई अन्य वित्तीय और व्यक्तिगत मानकों के आधार पर करते हैं।

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एक ही सैलरी पर एक को ज्यादा तो दूसरे को कम लोन क्यों?

कैसे तय होती है आपकी लोन की लिमिट

लोन तय करने में सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारक FOIR (Fixed Obligation to Income Ratio) होता है। एफओआईआर यह दर्शाता है कि आपकी मौजूदा मासिक आय का कितना प्रतिशत हिस्सा पहले से चल रही ईएमआई (EMI) या क्रेडिट कार्ड बिलों को चुकाने में जा रहा है। भले ही दो लोगों की सैलरी ₹1 लाख हो, लेकिन यदि एक व्यक्ति पहले से कोई ईएमआई नहीं दे रहा है, तो उसका एफओआईआर कम (0%) होगा। वहीं, यदि दूसरा व्यक्ति पहले से ₹40,000 की ईएमआई दे रहा है, तो उसकी नई ईएमआई चुकाने की क्षमता कम मानी जाएगी। बैंक आमतौर पर आपकी इन-हैंड सैलरी के 40% से 50% से अधिक राशि ईएमआई में नहीं जाने देते।

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