क्या आपको भी ऐसा लगता है कि सैलरी (Salary) तो हर साल बढ़ती है लेकिन इसका असर बचत पर बिल्कुल भी नहीं पड़ता। कई बार पहले से ज्यादा कमाई करने के बावजूद आर्थिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिखता। दरअसल, इसकी एक बड़ी वजह लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन (Lifestyle Inflation) होती है। आइए समझते हैं कि लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन क्या है और आपकी बचत कम कैसे होने लगती है-
सैलरी बढ़ने के बाद भी क्यों नहीं बढ़ती बचत (Photo: iStock)
क्या होता है लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन?
लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन का मतलब है कि जैसे-जैसे आपकी कमाई बढ़ती है, वैसे-वैसे आपके खर्च भी बढ़ने लगते हैं। कम कमाई में सस्ते मोबाइल से काम चल जाता था, लेकिन सैलरी बढ़ते ही महंगा स्मार्टफोन हाथ में आ जाता है। पहले सामान्य रेस्टोरेंट में खाना खाते थे, लेकिन सैलरी बढ़ते ही महंगे कैफे पसंद आने लगते हैं। इसी तरह नई कार, ब्रांडेड कपड़े, ट्रैवल और ऑनलाइन शॉपिंग पर खर्च बढ़ने लगता है। इन्हीं खर्चों में बढ़ोतरी के कारण सैलरी बढ़ने का फायदा बचत में दिखाई नहीं देता।
30,000 से 50,000 रुपये की सैलरी का गणित
मान लीजिए किसी व्यक्ति की शुरुआती मासिक सैलरी 30,000 रुपये है। वह हर महीने घर के खर्च, ट्रांसपोर्ट, शॉपिंग, बाहर खाने और अन्य जरूरतों पर कुल 27,000 रुपये खर्च करता है। इस तरह उसके पास हर महीने 3,000 रुपये बचते हैं। यानी वह अपनी सैलरी का 10 प्रतिशत हिस्सा बचा रहा है।
अब प्रमोशन के बाद उसकी सैलरी बढ़कर 50,000 रुपये हो जाती है। उसे लगता है कि अब वह पहले से ज्यादा पैसे बचा पाएगा। लेकिन बढ़ी हुई कमाई के साथ उसके खर्च भी बढ़ने लगते हैं। अब वह घर के खर्च पर 17,000 रुपये, ट्रांसपोर्ट पर 5,000 रुपये, शॉपिंग और मनोरंजन पर 10,000 रुपये, बाहर खाने पर 6,000 रुपये और अन्य जरूरतों पर 7,000 रुपये खर्च करने लगता है। इस तरह उसका कुल मासिक खर्च 45,000 रुपये हो जाता है और बचत सिर्फ 5,000 रुपये रहती है।
अब इस गणित को कुछ इस तरह समझिए व्यक्ति की सैलरी 30,000 से बढ़कर 50,000 रुपये हो गई, यानी 20,000 रुपये या करीब 66.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। लेकिन उसकी बचत सिर्फ 3,000 से बढ़कर 5,000 रुपये हुई। यानी अतिरिक्त 20,000 रुपये में से 18,000 रुपये बढ़े हुए खर्चों में चले गए।
लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन से कैसे बचें?
लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि सैलरी बढ़ते ही खर्च बढ़ाने के बजाय बचत और निवेश बढ़ाएं। बढ़ी हुई सैलरी का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा SIP, RD या इमरजेंसी फंड में डाल सकते हैं। गैर-जरूरी सब्सक्रिप्शन, बार-बार ऑनलाइन शॉपिंग और दिखावे वाले खर्चों पर नियंत्रण रखें।
