‘सखी सैंया तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है’ - 2010 में आई पीपली लाइव फिल्म का यह गाना इन दिनों फिर मौजू हो गया है। ईरान संकट के चलते पेट्रोल, डीजल, CNG समेत जरूरी खाने-पीने के सामान तेजी से महंगे हुए हैं। इससे आम आदमी पर बोझ बढ़ा है। पहले से ही हर साल स्कूल फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी, इलाज का बढ़ता खर्च, और रेंट से लेकर होम-कार लोन की भारी-भरकम EMI के दलदल में फंसा आम आदमी अब बढ़ती महंगाई को सहन नहीं कर पा रहा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि तनख्वाह तो आती है, लेकिन जाती कहां है? आज हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है कि कर्ज चुकाने से लेकर बच्चों की फीस तक, क्या अब जिंदगी सिर्फ बिल भरने के लिए रह गई है? आइए समझते हैं कि महंगाई से कैसे घुट रहा है आम आदमी का दम।
महंगाई की मार
रेंट से लेकर EMI का बोझ सहना मुश्किल
नोएडा एक्सटेंशन में रहने वाले मुकेश कुमार झा कहते हैं कि इस महंगाई में अब रहना मुश्किल हो रहा है। वे बताते हैं कि आज से तीन साल पहले यहां पर 2बीएचक फ्लैट की कीमत 35 से 40 लाख रुपये थी। अगर कोई पैसे बचाकर फ्लैट खरीदता थो तो उसकी ईएमआई 25 से 30 हजार रुपये मंथली आती थी। आज उसी फ्लैट की कीमत 1 करोड़ के करीब पहुंच गई है। यानी अगर कोई नौकरीपेशा हिम्मत कर फ्लैट खरीदें भी तो उसे 70 से 80 हजार रुपये मंथली ईएमआई अगले 20 साल तक चुकानी होगी। इस दौरान नौकरी रहेगी या नहीं, यह अलग संकट। फ्लैट की कीमत आसमान पर पहुंचने से रेंटल में भी बढ़ोतरी हुई है। जिस फ्लैट का रेंट 15 हजार रुपये प्रति महीना था वो आज के समय में 25 हजार रुपये हो गया है।
इतना ही नहीं, स्कूल फीस में भी बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। इसे रोकने वाला कोई नहीं है। अगर किसी की सैलरी 1 लाख रुपये भी हो और वह होम लोन की ईएमआई चुका रहा है और दो बच्चों को स्कूल में पढ़ा रहा है तो उसे खर्च चलाना मुश्किल होगा। झा कहते हैं कि कितने लोगों की सैलरी 1 लाख है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कम सैलरी या फैक्ट्री में काम करने वालों का क्या हाल है?
आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया
पटना में रहने वाले राजन उपाध्याय बताते हैं कि मौजूदा महंगाई के इस दौर में हालत 'आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया' वाली हो गई है; जेब कब खाली हो जाती है, पता ही नहीं चलता। साल-दर-साल जिस तेजी से महंगाई बढ़ रही है, उस अनुपात में हमारी सैलरी नहीं बढ़ रही है। इससे संकट लगातार बढ़ रहा है। राजन कहते हैं कि घर का खर्च चलाना, बच्चों की पढ़ाई, स्कूल फीस, किराया, बिजली-पानी के बिल और ऊपर से पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों ने बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। पहले जहां कुछ बचत हो जाती थी, अब महीने के आखिर तक हाथ तंग पड़ जाता है। अगर अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी या बड़ा खर्च आ जाए तो पूरा हिसाब गड़बड़ा जाता है।
आर्थिक विशेषज्ञों क्या कहते हैं?
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही सरकारी आंकड़ों में महंगाई दर कम है (अप्रैल में खुदरा महंगाई 3.48% रही), लेकिन यह हकीकत से मेल नहीं खाती है। अधिकांश परिवारों की खरीदने की क्षमता कम हो रही है और कर्ज बढ़ रहा है।
कर्ज और EMI का मकड़जाल: भारत में घरेलू कर्ज का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई (GDP के 41% के पार) पर पहुंच चुका है। लोग बचत करने के बजाय मोबाइल, गाड़ी या रोजमर्रा की जरूरतों के लिए कर्ज ले रहे हैं। हालत यह है कि कई लोग अपनी सैलरी का 40% से ज्यादा हिस्सा सिर्फ EMI भरने में दे रहे हैं।
महंगे घर और भारी किराया: पिछले 5 सालों में प्रॉपर्टी की कीमतें 45-50% तक बढ़ गई हैं, लेकिन उस हिसाब से लोगों की तनख्वाह नहीं बढ़ी है। नतीजा यह है कि पहली बार घर खरीदने की सोचने वालों का सपना अब नामुमकिन सा हो गया है और शहरों में हर महीने भारी-भरकम किराया चुकाना एक बड़ा आर्थिक बोझ बन चुका है।
इलाज का जानलेवा खर्च: मेडिकल महंगाई दर करीब 14% की रफ्तार से भाग रही है। आज के दौर में परिवार का कोई एक सदस्य भी अगर गंभीर बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हो जाए, तो पूरे घर का बजट एक झटके में तबाह हो जाता है।
महंगी पढ़ाई: अच्छे स्कूल और कॉलेजों की फीस इतनी ज्यादा हो चुकी है कि मिडिल क्लास माता-पिता के लिए बच्चों को पढ़ाना भारी पड़ रहा है।
रसोई का बिगड़ता बजट: वैसे तो खाने-पीने की चीजों की औसतन महंगाई काबू में दिखती है, लेकिन हकीकत इससे मेल नहीं खाती है। तमाम जरूरी सामान के दाम बढ़ रहे हैं।
सैलरी में मामूली बढ़ोतरी: बढ़ती महंगाई के अनुसार, सैलरी में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। सालाना सैलरी में बढ़ोतरी अक्सर 5-7% होती है, जो बढ़ती महंगाई के हिसाब से काफी नहीं होती। व्हाइट-कॉलर/IT नौकरियों पर AI/ऑटोमेशन का खतरा मंडरा रहा है। छोटे कारोबारियों का कहना है कि महंगाई बढ़ने से लोग सोच-समझकर खर्च कर रहे हैं, जिसकी वजह से उनकी बिक्री में गिरावट आई है।
मिडिल क्लास संकट
