Gold-Silver Prices में हल्की नरमी के मुकाबले Gold-Silver ETF में 15-20% तक की तेज गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है। इसकी वजह से तमाम निवेशकों के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इंटरनेशनल स्पॉट और फिजिकल मार्केट में गिरावट सीमित रही, तो ETF इतने ज्यादा क्यों टूटे। क्या यह सिर्फ प्रीमियम और वोलैटिलिटी का करेक्शन है या फिर प्राइस ट्रेंड किसी बदलाव का संकेत?
गोल्ड सिल्वर ईटीएएफ का आगे क्या होगा
मार्केट ओवरव्यू
22 जनवरी को भारतीय बाजार में गोल्ड और सिल्वर ETF में तेज करेक्शन देखा गया। कुछ फंड्स में गिरावट 15-20% तक पहुंच गई, जिससे ETF और इंटरनेशनल प्राइस के बीच पहले जो प्रीमियम बना हुआ था, वह लगभग खत्म हो गया। Tata AMC, Nippon India Silver ETF और ICICI Prudential Silver ETF जैसे तमाम ETF में तेज गिरावट आई, क्योंकि बाजार में वोलैटिलिटी बढ़ने के साथ निवेशकों ने मुनाफा काटना शुरू कर दिया। हालांकि, ETF की तुलना में फिजिकल सिल्वर और इंटरनेशनल स्पॉट मार्केट में उतार-चढ़ाव सीमित रहा। ग्लोबल स्पॉट सिल्वर हाल ही में करीब $92.27 प्रति औंस पर स्थिर हुआ, जो कुछ समय पहले $95.87 के हाई के बाद आया। वहीं MCX मार्च सिल्वर फ्यूचर्स इसी अवधि में करीब 2% तक ही नीचे आया।
ETF में ज्यादा गिरावट की 5 बड़ी वजहें
1. प्रीमियम खत्म हुआ
भारत में कई बार गोल्ड और सिल्वर ETF अपनी वास्तविक वैल्यू यानी NAV (Net Asset Value) से ऊपर प्रीमियम पर ट्रेड करने लगते हैं। जब निवेशकों की मांग अचानक बढ़ती है या बाजार में तेजी आती है, तो ETF की ट्रेडिंग प्राइस NAV से काफी ऊपर निकल जाती है। अब जैसे ही बाजार में करेक्शन आया, यह प्रीमियम तेजी से खत्म हुआ। इसी वजह से ETF की गिरावट असली सोने-चांदी के मुकाबले ज्यादा दिखाई दी।
2. तुरंत दिखता असर
ETF एक्सचेंज पर शेयर की तरह ट्रेड होते हैं। इसमें निवेशक सेकंड्स में खरीद-बिक्री कर सकते हैं। जब अचानक बिकवाली बढ़ती है तो ETF में गिरावट तेज हो जाती है, जबकि फिजिकल मार्केट में प्राइस मूवमेंट इतना तेज नहीं होता।
3. प्रॉफिट बुकिंग ने बढ़ाया प्रेशर
जब किसी एसेट में तेज रैली आती है, तो निवेशक अक्सर मुनाफा काटते हैं। यही प्रॉफिट बुकिंग ETF में ज्यादा तेजी से दिखती है, क्योंकि इसमें ट्रेडिंग वॉल्यूम ज्यादा रहता है। Prithvi Finmart के मनोज कुमार जैन के मुताबिक, नई पोजिशन लेने से पहले बाजार के स्थिर होने का इंतजार करना बेहतर है।
4. मजबूत डॉलर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में US डॉलर मजबूत होने पर गोल्ड और सिल्वर जैसे सेफ-हेवन एसेट्स की डिमांड कमजोर होती है। इसका असर कीमतों पर दबाव के रूप में दिखता है और ETF में निवेशक सेंटीमेंट भी जल्दी बदलता है।
5. जियोपॉलिटिकल टेंशन में कमी
जब वैश्विक तनाव कम होता है तो निवेशक जोखिम वाले एसेट्स की तरफ लौटते हैं। ऐसे में सोना-चांदी से पैसा निकलता है और ETF में गिरावट तेज हो सकती है।
INVasset PMS के अनिरुद्ध गर्ग के मुताबिक, सिल्वर ETF में दिखी वोलैटिलिटी ग्लोबल सिल्वर ट्रेंड बदलने का संकेत नहीं है, बल्कि भारत में बने कुछ मार्केट डिस्टॉर्शन का नॉर्मलाइजेशन है।
निवेशक अब क्या करें?
लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे शॉर्ट टर्म गिरावट देखकर जल्दबाजी में फैसला न लें। Stockify के फाउंडर और CEO पियूष झुनझुनवाला के मुताबिक, यह गिरावट ज्यादातर शॉर्ट टर्म वोलैटिलिटी का असर है, न कि वैल्यू में कोई स्थायी गिरावट।
अगर आप नई खरीदारी करना चाहते हैं
बाजार स्थिर होने तक थोड़ा इंतजार करना बेहतर हो सकता है। एकमुश्त निवेश करने की बजाय SIP या स्टेप-बाय-स्टेप खरीदारी ज्यादा सुरक्षित रणनीति मानी जाती है। इससे गलत टाइमिंग का रिस्क कम हो जाता है।
ETF में निवेश से पहले ये बात जरूर समझें
ETF की कीमत कई बार NAV से ऊपर या नीचे ट्रेड कर सकती है। ऐसे में निवेशकों को ETF का प्रीमियम और NAV ट्रैक करना चाहिए, ताकि वे हाई प्रीमियम पर खरीदारी से बच सकें। वहीं, लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए यह समय घबराने का नहीं, बल्कि सही एलोकेशन और एवरेजिंग रणनीति के साथ टिके रहने का है।
आगे क्या आउटलुक है?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिल्वर में लॉन्ग टर्म डिमांड मजबूत बनी रह सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सिल्वर का इस्तेमाल सिर्फ ज्वेलरी तक सीमित नहीं है, बल्कि सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स जैसे इंडस्ट्रियल सेक्टर्स में इसकी खपत लगातार बढ़ रही है। हालांकि, सिल्वर की वोलैटिलिटी गोल्ड के मुकाबले ज्यादा होती है। इसलिए निवेशकों को बैलेंस्ड एलोकेशन और डिसिप्लिन के साथ इसमें निवेश करना चाहिए।
