China property crisis: चीन का प्रॉपर्टी मार्केट क्रैश कर गया है। घर की कीमत 2005 के लेवल पर पहुंच गई है। यानी कीमतें 20 साल पीछे चली गई है। सरल शब्दों में कहें तो प्रॉपर्टी की कीमत आज से 20 साल पहले जितनी थी, वहीं पहुंच गई है। चीन में फूटा प्रॉपर्टी का गुब्बारा, रियल एस्टेट में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए सबक से कम नहीं है। आमतौर पर प्रॉपर्टी मेंं निवेश करने वाले निवेशकों को लगता है कि इसमें शेयर बाजार जैसा क्रैश नहीं आ सकता है और कीमतें साल दर साल बढ़ती रहती हैं।
हालांकि, ऐसा नहीं हैं। प्रॉपर्टी की कीमत भी गिरती है। चीन का प्रॉपर्टी बाजार लाखों निवेशकों को हकीकत से रूबरू करा रहा है। खैर, भारत के लिए इससे क्या सबक है? यहां तो प्रॉपर्टी की कीमत लगातार बढ़ रही है और मांग बनी हुई है? अगर आप भी प्रॉपर्टी की दुनिया में पैसा लगाते हैं या अपना घर खरीदने की योजना बना रहे हैं तो इस सवाल का जवाब जरूर ढूंढ रहे होंगे। आइए आपको पूरे परिप्रेक्ष्य से समझाते हैं कि चीन में प्रॉपर्टी का गुब्बारा आखिर कैसे फूटा, इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं, और यह संकट सिर्फ चीन तक सीमित क्यों नहीं है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत जैसे देशों के लिए भी एक अहम संकेत है।
चीन के प्रॉपर्टी बाजार में ऐसे बना बबल
आपको बता दें कि चीन में 2000 के बाद घर खरीदना सिर्फ रहने के लिए नहीं, बल्कि पैसा बनाने का सबसे सुरक्षित तरीका बन गया। आम लोगों का शेयर बाजार पर भरोसा कम था, बैंक डिपॉजिट पर रिटर्न सीमित था, ऐसे में रियल एस्टेट सबसे आकर्षक विकल्प बन गया। चीन की सरकार ने भी इस ट्रेंड को सपोर्ट किया। इसके लिए आसान लोन, बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और शहरीकरण को बढ़ावा दिया। नतीजा, हर कोई प्रॉपर्टी खरीदना लगा, चाहे रहने के लिए हो या निवेश के लिए।
डेवलपर्स ने इस बढ़ती मांग को भुनाने के लिए बैंक से भारी कर्जद लिया। इस मॉडल का सबसे बड़ा चेहरा बना Evergrande Group, जिसने इतना विस्तार किया कि वह दुनिया की सबसे कर्जदार रियल एस्टेट कंपनियों में शामिल हो गया। लेकिन यह मॉडल एक शर्त पर टिका था, कीमतें लगातार बढ़ती रहें। जैसे ही यह चक्र टूटा, पूरा ढांचा हिल गया। अब पूरा चीनी प्रॉपर्टी मार्केट मंदी की चपेट में है।
आमतौर पर प्रॉपर्टी संकट 5 साल में संभल जाता है (जैसा अमेरिका और स्पेन में हुआ), लेकिन चीन की स्थिति जापान की 1991 की मंदी जैसी दिख रही है, जो एक दशक से ज्यादा चली थी। विश्लेषकों का अनुमान है कि चीन का रियल एस्टेट सेक्टर अगले 10 सालों तक नकारात्मक या सपाट विकास देख सकता है।
थ्री रेड लाइन्स भी एक बड़ी वजह
चीन के प्रॉपर्टी मार्केट में बड़ी मंदी के पीछे एक मुख्य वजह 'थ्री रेड लाइन्स' (Three Red Lines) नीति है। 2020 में चीनी सरकार ने डेवलपर्स के बढ़ते कर्ज को रोकने के लिए सख्त नियम लागू किए। इससे 'एवरग्रैंड' (Evergrande) और 'कंट्री गार्डन' (Country Garden) जैसे दिग्गज डेवलपर्स के पास कैश की कमी हो गई। प्रोजेक्ट्स अधूरे रह गए, खरीदारों ने किश्तें देना बंद कर दिया और पूरा बैंकिंग सिस्टम हिल गया। आज स्थिति यह है कि खरीदार गायब हैं और विक्रेता किसी भी कीमत पर अपनी संपत्ति से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। यह "प्रॉपर्टी बबल" (Property Bubble) फटने का क्लासिक उदाहरण है।
भारत के लिए खतरे की घंटी क्यों?
भातरीय प्रॉपर्टी मार्केट में अभी भी तेजी बनी हुई है। इसके चलते प्रॉपर्टी की कीमतें भी बढ़ रही हैं। हालांकि, जिस तरह से बिल्डर, ब्रोकर और कुछ मुट्ठी भर निवेशक कीमत को आम आदमी से बाजार ले जा रहे हैं और लोग चाहकर भी अपना घर नहीं खरीद पा रहे हैं, ये चिंता की बात है। कई भारतीय शहरों में कीमतें आसमान छू रही हैं। वहीं दूसरी ओर रुपया कमजोर होने, शेयर बाजार की अस्थिरता और एआई (AI) के कारण नौकरियों पर मंडराते खतरे ने स्थिति और खराब होने की आशंका है।
उदाहरण के लिए जिस दिल्ली-एनसीआर में आज से 4 साल पहले तक 2बीएचके फ्लैट बड़े आसानी से 40 से 50 लाख में मिल रहा था, वहां पर कीमतें 1 करोड़ के पार पहुंच गई है। यह सब डिमांड और सप्लाई के बदौलत नहीं हुआ बल्कि बिल्डर, ब्रोकर और कुछ निवेशकों के खेल के कारण हुआ है। इस सब के पीछे सरकार की चुप्पी भी बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन जिस तरह से भारतीय शेयर बाजार पिछले दो साले से निवेशकों को रुला रहा है, आज न कल यहां पर भी मंदी आना तय है।
China Vs India Property Market
भारत के पास वक्त रहते सबक लेने का मौका
रियल एस्टेट एक्सपर्ट का कहना है कि चीन की इस तबाही से सीखते हुए भारत के पास वक्त रहते सबक लेने का मौका है। इसके लिए भारत को कई कदम उठाने होंगे।
1. आर्टिफिशियल डिमांड से बचना
जब निवेश की उम्मीद में घर खरीदे जाते हैं, तो आर्टिफिशियल डिमांड पैदा होती है। इससे कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाती हैं। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि रियल एस्टेट बाजार 'उपयोगकर्ताओं' (Users) द्वारा संचालित हो, न कि केवल 'सट्टेबाजों' द्वारा। भारतीय रियल एस्टेट मार्केट तेजी से एंड यूजर्स के हाथों से निकलकर इन्वेस्टर्स के कब्जे में जा रहा है। यह खतरे की घंटी है।
2. अफोर्डेबल हाउसिंग को बढ़ावा मिले
चीन ने लग्जरी अपार्टमेंट्स का अंबार लगा दिया, जबकि जरूरत सस्ते घरों की थी। इससे वहां मंदी आ गई। भारत में भी यही स्थिति बनी रही है। प्राइवेट डेवलपर्स अब सस्ते घर बना नहीं रहे हैं, जिनकी मांग सबसे अधिक है। हर कोई करोड़ों के फ्लैट बेच रहा है। आम आदमी चाहकर भी अपना घर खरीद नहीं पा रहा है। इस समस्या को जल्द से जल्द ठीक करना होगा।
3. इन्वेंट्री और अधूरे प्रोजेक्ट्स
भारत में भी हजारों खरीदार सालों से अपने घर का इंतजार कर रहे हैं। चीन का संकट सिखाता है कि अगर समय पर प्रोजेक्ट पूरे नहीं हुए, तो पूरा सेक्टर धराशायी हो सकता है।
