अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी से दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ी हुई है, लेकिन भारत अब सिर्फ टैरिफ के दबाव का जवाब देने के बजाय विदेशी निवेश के लिए अपना बड़ा प्लान तैयार कर रहा है। सरकार अगले 2-3 महीनों में यूरोपीय संघ (EU), स्विट्जरलैंड, सऊदी अरब, ओमान और मालदीव के साथ नए द्विपक्षीय निवेश समझौते यानी (BIT) को अंतिम रूप देने की तैयारी में है।
पांच देशों के साथ निवेश समझौते की तैयारी में भारत
इन समझौतों का मकसद सिर्फ विदेशी कंपनियों को भारत में पैसा लगाने के लिए सुरक्षा देना नहीं है, बल्कि भारत को ग्लोबल निवेश के लिए ज्यादा आकर्षक बनाना भी है। सरकार पुराने और ज्यादा सख्त निवेश समझौता मॉडल में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है।
भारत का नया दांव क्या है?
भारत अब निवेश समझौतों में हर देश के लिए एक जैसी शर्तें रखने के बजाय ज्यादा लचीला रास्ता अपनाना चाहता है। यानी किसी देश के साथ उसके रणनीतिक महत्व, निवेश संबंधों और दोनों देशों के कारोबारी हितों को देखते हुए अलग-अलग प्रावधान तय किए जा सकते हैं। सरकार नए मॉडल को कैबिनेट के सामने रखने की तैयारी में है। इसे बीआईटी 4.0 के तौर पर देखा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा बदलाव विदेशी निवेशकों के लिए विवाद निपटारे की प्रक्रिया से जुड़ा है।
क्या है मौजूदा व्यवस्था?
मौजूदा ढांचे में विदेशी निवेशक को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता अपनाने से पहले लंबे समय तक घरेलू कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना पड़ता है। अब इसे घटाकर करीब 2 साल करने का प्रस्ताव सामने आया है। हालांकि, हर देश के साथ अंतिम अवधि बातचीत के आधार पर तय हो सकती है। हाल के भारत-यूएई और भारत-इजरायल निवेश समझौतों में यह अवधि 5 साल से घटाकर 3 साल की गई है।
भारत क्यों बदल रहा है रणनीति?
भारत के लिए इस समय सिर्फ अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब अपने निवेश और सप्लाई चेन को एक से ज्यादा देशों में फैलाना चाहती हैं। ऐसे में भारत के पास ग्लोबल कंपनियों को आकर्षित करने का बड़ा मौका है। टैरिफ की अनिश्चितता ने भी कंपनियों को अपनी ग्लोबल सप्लाई चेन को नए सिरे से देखने के लिए मजबूर किया है।
ट्रंप की अस्थिर नीतियों का भी असर
ट्रंप प्रशासन की लगातार बदलती टैरिफ नीति ने कारोबारियों के लिए लागत और भविष्य की योजना को ज्यादा मुश्किल बनाया है। ऐसे माहौल में भारत का संदेश साफ है कि अगर दुनिया की कंपनियां अपना निवेश और उत्पादन अलग-अलग देशों में फैलाना चाहती हैं तो भारत उन्हें लंबी अवधि की सुरक्षा और बड़ा बाजार दे सकता है। यही वजह है कि सरकार अब निवेश समझौतों को ज्यादा व्यावहारिक बनाने पर जोर दे रही है।
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