Zero-Cost EMI का सच: Credit Card से किस्तों में खरीदना वाकई सस्ता है या एकमुश्त पेमेंट बेहतर?

Zero-Cost EMI का मतलब हमेशा एक्स्ट्रा कॉस्ट नहीं होता। इसमें ब्याज की लागत मर्चेंट डिस्काउंट से एडजस्ट हो सकती है, लेकिन प्रोसेसिंग फीस, GST और दूसरे शुल्क कुल खर्च बढ़ा सकते हैं।

त्योहारी सीजन की शुरुआत हो गई है। आने वाले दिनों में नवरात्रि, दुर्गापूजा, धनतेरस और दिवाली की धूम रहेगी। इस दौरान लोग जमकर महंगा मोबाइल, टीवी, लैपटॉप या दूसरी जरूरी चीज की खरीदारी करेंगे। अगर आप भी अपनी पसंद की कोई चीज खरीदने की योजना बना रहे हैं तो Zero-Cost EMI काफी आकर्षक लग सकती है। तमाम बड़े स्टोर बिक्री बढ़ाने के लिए इस स्कीम को लेकर आते हैं। यह देखने में तो काफी अच्छा लगता है, लेकिन इसके पीछे भी कैच होता है। आइए समझते हैं।

Zero Cost EMI (AI Image)

ब्याज मुक्त ईएमआई

इस तरह होता है पूरा खेल

Zero-Cost EMI में ब्याज की लागत को आमतौर पर मर्चेंट डिस्काउंट के जरिए एडजस्ट किया जाता है। यानी बैंक या कार्ड जारी करने वाली कंपनी, प्रोडक्ट की बिक्री करने वाले स्टोर से ब्याज वसूलते है। इससे ब्याज जीरो लगता है लेकिन असल में होता नहीं। दुकानदार जो ब्याज चुकाते हैं, वह उस प्रोडक्ट के जरिये वसूलते हैं। इसलिए कुछ भी जीरो नहीं होता। हां, यह लगता जरूर है।

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