माटी का हुनर और इनोवेशन: मंसुखभाई प्रजापति ने कैसे मिट्टी के बर्तन के कारोबार को Mitticool ब्रांड में बदला

Success Story: गुजरात के मनसुखभाई प्रजापति ने 2001 के भूकंप के बाद बिना बिजली के चलने वाला 'मिट्टीकूल फ्रिज' बनाया। उनकी इनोवेशन सोच ने पारंपरिक कुम्हारी को वैश्विक और ईको-फ्रेंडली ब्रांड में बदल दिया।

Success Story : भारत के ग्रामीण इलाकों में मिट्टी के बर्तन बनाना सदियों पुराना बिजनेस रहा है, लेकिन गुजरात के वांकानेर गांव के मनसुखभाई प्रजापति (Mansukhbhai Prajapati) ने इस पारंपरिक कला को एक नया आयाम दिया। बिना किसी औपचारिक इंजीनियरिंग या बिजनेस डिग्री के, उन्होंने मिट्टी से बने ऐसे आधुनिक प्रोडक्ट तैयार किए जिन्होंने न सिर्फ ग्रामीण इनोवेशन को नई पहचान दी, बल्कि 'मिट्टीकूल' (Mitticool) नाम से एक बहुचर्चित स्वदेशी ब्रांड खड़ा कर दिया।

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गुजरात के मनसुखभाई प्रजापति की सक्सेस स्टोरी (तस्वीर-X)

संघर्षों से भरा शुरुआती दौर और कुम्हारी से जुड़ाव

गुजरात के मोरबी जिले के रहने वाले मनसुखभाई का शुरुआती जीवन बेहद गरीबी और संघर्षों में बीता। साल 1979 में मच्‍छू बांध टूटने से उनके परिवार का पारंपरिक बिजनेस पूरी तरह तबाह हो गया था। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी और पेट पालने के लिए एक चाय की दुकान पर काम करना पड़ा। बाद में उन्होंने एक टाइल फैक्ट्री में काम किया, जहां उन्होंने मिट्टी की ढलाई, उसकी मजबूती और सुखाने की तकनीकों को गहराई से समझा। साल 1988 में उन्होंने 30,000 रुपये का कर्ज लेकर खुद का काम शुरू किया और एक हैंड-ऑपरेटेड प्रेस मशीन की मदद से मिट्टी के तवे और मटके बनाना शुरू किया।

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