Real Estate News : सुप्रीम कोर्ट ने घर खरीदारों के हित में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में देरी मूल डेवलपर की गलती से हुई है और बाद में वह कंपनी दिवालिया हो जाती है, तो उस देरी की पेनल्टी का बोझ घर खरीदारों या नए रिजॉल्यूशन आवेदक पर नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने कहा कि नए खरीदारों और प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाने वाले लोगों को पुराने डेवलपर की गलती की सजा देना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का घर खरीदारों के हित में अहम फैसला
नोएडा अथॉरिटी की पेनल्टी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बैंच ने इस मामले में नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के फैसले को रद्द कर दिया। NCLAT ने नोएडा अथॉरिटी की ओर से लगाए गए टाइम-एक्सटेंशन चार्ज यानी निर्माण में देरी के लिए लगने वाले शुल्क को कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) की लागत मानने की अनुमति दी थी। इसका मतलब यह था कि इन शुल्कों की भरपाई नए रिजॉल्यूशन आवेदक और उन घर खरीदारों से की जा सकती थी, जो अटके हुए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पैसा जुटा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के चार्ज असल में दंडात्मक यानी पेनल्टी की प्रकृति के हैं। इसलिए पुराने डेवलपर की गलती के कारण हुई देरी के लिए घर खरीदारों या नए डेवलपर को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा।
दो बड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा है मामला
द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला नोएडा के सेक्टर-100 स्थित Lotus Boulevard और सेक्टर-110 स्थित Lotus Panache हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा है। इन दोनों परियोजनाओं को Granite Gate Properties Pvt. Ltd. विकसित कर रही थी। नोएडा अथॉरिटी ने कंपनी को जमीन और डेवलपमेंट राइट्स दिए थे ताकि वहां हाईराइज रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट बनाए जा सकें। इन प्रोजेक्ट्स को साल 2016 तक पूरा किया जाना था। हालांकि कंपनी आर्थिक संकट में फंस गई और समय पर निर्माण पूरा नहीं कर सकी। बाद में साल 2019 में कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया गया। इसके बाद कंपनी इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी IBC के तहत कॉरपोरेट डेब्टर बन गई।
घर खरीदारों ने खुद जुटाया पैसा
कंपनी के दिवालिया होने के बाद प्रोजेक्ट का भविष्य अधर में लटक गया। ऐसे में घर खरीदारों को भी समाधान प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ी। उन्हें वित्तीय लेनदारों की एक क्लास के रूप में कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) में शामिल किया गया। अटके हुए प्रोजेक्ट का निर्माण पूरी तरह बंद न हो, इसके लिए घर खरीदारों ने खुद पैसा जुटाया। इसके लिए “Pool and Build” व्यवस्था अपनाई गई। इस व्यवस्था के तहत खरीदारों ने मिलकर निर्माण को आगे बढ़ाने के लिए रकम उपलब्ध कराई, ताकि नया रिजॉल्यूशन प्लान लागू होने तक प्रोजेक्ट का काम चलता रहे। बाद में M/s SMV Agencies Private Limited को सफल रिजॉल्यूशन आवेदक यानी Successful Resolution Applicant (SRA) के रूप में चुना गया। कंपनी को रिजॉल्यूशन प्लान के तहत प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी मिली।
नोएडा अथॉरिटी ने मांगा देरी का चार्ज
इस दौरान नोएडा अथॉरिटी ने प्रोजेक्ट में हुई देरी के लिए टाइम-एक्सटेंशन चार्ज की मांग की। ये शुल्क उस स्थिति में लगाए जाते हैं जब डेवलपर तय समयसीमा में निर्माण पूरा नहीं करता। लीज डीड के मुताबिक शुरुआती व्यवस्था में पहले तीन साल की देरी के लिए अलग-अलग दरें तय थीं। पहले साल 4 प्रतिशत, दूसरे साल 5 प्रतिशत और तीसरे साल 6 प्रतिशत के हिसाब से चार्ज लगाया जाना था। इसके बाद लीज रद्द करने का अधिकार भी अथॉरिटी के पास था। बाद में नोएडा अथॉरिटी की 2015 और 2019 की नीतियों के जरिए इस व्यवस्था को और आगे बढ़ाया गया। अथॉरिटी ने 10 साल तक के लिए बढ़ी हुई दरों पर टाइम-एक्सटेंशन चार्ज की मांग की।
NCLT और NCLAT में भी पहुंचा मामला
मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के सामने पहुंचा। NCLT ने रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी देते हुए नोएडा अथॉरिटी के टाइम-एक्सटेंशन चार्ज से जुड़े दावे पर भी आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने शुरुआती तीन साल के टाइम-एक्सटेंशन चार्ज को CIRP कॉस्ट मानने का निर्देश दिया। इस फैसले से घर खरीदार और नोएडा अथॉरिटी दोनों संतुष्ट नहीं हुए। दोनों पक्षों ने NCLAT में अपील की। NCLAT ने कहा कि लीज डीड के तहत लगाए गए टाइम-एक्सटेंशन चार्ज को CIRP कॉस्ट माना जा सकता है, लेकिन इसकी सीमा अधिकतम तीन साल तक ही होगी। यानी नोएडा अथॉरिटी की 10 साल तक के चार्ज वसूलने की मांग को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा NCLAT का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले में यह देखा कि क्या नोएडा अथॉरिटी की ओर से लगाया गया टाइम-एक्सटेंशन चार्ज वास्तव में CIRP के दौरान होने वाली लागत माना जा सकता है। कोर्ट ने लीज डीड और नोएडा अथॉरिटी के उद्देश्य पर भी गौर किया। कोर्ट ने कहा कि नोएडा अथॉरिटी का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं है। उसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य इलाके का विकास करना, उद्योग और व्यापार को बढ़ावा देना और लोगों के लिए आवास उपलब्ध कराना भी है। ऐसे में विकास का उद्देश्य सबसे महत्वपूर्ण है।
कोर्ट ने माना कि टाइम-एक्सटेंशन चार्ज का मकसद डेवलपर को समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए प्रेरित करना और देरी को रोकना है। लेकिन जब मूल डेवलपर ही आर्थिक संकट में फंसकर दिवालिया हो गया और उसके बाद घर खरीदारों तथा नए रिजॉल्यूशन आवेदक ने प्रोजेक्ट पूरा करने की जिम्मेदारी उठाई, तो पुराने डेवलपर की गलती का दंड नए पक्षों पर डालना उचित नहीं है।
घर खरीदारों को नहीं मिलेगी पुराने डेवलपर की गलती की सजा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देरी के लिए घर खरीदार और SRA जिम्मेदार नहीं हैं। इसलिए उन पर पुराने डेवलपर की गलती का पेनल्टी चार्ज लगाना सही नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि घर खरीदारों और नए रिजॉल्यूशन आवेदक को कॉरपोरेट डेब्टर के पिछले पापों के लिए दंडित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT का आदेश रद्द कर दिया और टाइम-एक्सटेंशन चार्ज को CIRP कॉस्ट मानने वाले आदेशों को भी हटा दिया। सीधे शब्दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है, डेवलपर की पुरानी गलती के कारण हुए निर्माण विलंब की पेनल्टी उन घर खरीदारों या नए आवेदक से नहीं वसूली जा सकती, जो बाद में अटके हुए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए आगे आए हैं।
