Operation Economic Outcast: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग करने के लिए आर्थिक दबाव बढ़ा दिया है। इस अभियान के तहत ईरान की तेल से होने वाली कमाई, शिपिंग, बैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को निशाना बनाया जा रहा है। अमेरिका का दबाव सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। ईरान के साथ कारोबार करने वाली कंपनियों और देशों पर भी सेकेंडरी प्रतिबंधों का खतरा मंडरा रहा है। भारत के लिए यह मामला इसलिए अहम है, क्योंकि भले ही पिछले कुछ वर्षों में भारत और ईरान के बीच सीधा व्यापार काफी कम हुआ है, लेकिन इसका असर भारत तक कई दूसरे रास्तों से पहुंच सकता है।
ईरान की आर्थिक घेराबंदी कड़ी
भारत-ईरान व्यापार अब कितना बचा?
कुछ साल पहले तक ईरान भारत के अहम कारोबारी साझेदारों में शामिल था। खासकर ईरानी कच्चे तेल की खरीद की वजह से दोनों देशों के बीच कारोबार काफी बड़ा था। लेकिन, अमेरिकी प्रतिबंधों और ईरानी तेल पर निर्भरता घटने के बाद यह कारोबार तेजी से नीचे आया। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का ईरान को निर्यात वित्त वर्ष 2019 में करीब 3.5 अरब डॉलर था। वित्त वर्ष 2026 में यह घटकर करीब 1.2 अरब डॉलर रह गया। भारत से ईरान को मुख्य रूप से चावल, चाय, दवाइयां, केला, चीनी और दाल जैसी वस्तुओं का निर्यात किया जाता है। भारत का ईरान से आयात इससे भी ज्यादा गिरा है। वित्त वर्ष 2019 में यह करीब 13.5 अरब डॉलर था, लेकिन ईरानी कच्चे तेल का आयात लगभग बंद होने के बाद वित्त वर्ष 2026 में यह 375 मिलियन डॉलर से भी नीचे आ गया।
असली खतरा तेल के मोर्चे पर
ईरान संकट का भारत पर सबसे बड़ा असर कच्चे तेल के जरिए पड़ सकता है। अगर अमेरिकी आर्थिक दबाव के चलते ईरान की तेल सप्लाई और ज्यादा बाधित होती है या पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ सकती है। GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भी चेतावनी दी है कि होर्मुज में व्यवधान भारत के तेल आयात बिल को तेजी से बढ़ा सकता है।
महंगा तेल कैसे बढ़ाएगा महंगाई?
कच्चा तेल सिर्फ पेट्रोल और डीजल की कीमत तय करने वाला अकेला कारक नहीं है। इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था में फैलता है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने पर माल ढुलाई की लागत बढ़ती है। इससे फल-सब्जियों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। पेट्रोकेमिकल और प्लास्टिक से जुड़े उद्योगों की लागत भी बढ़ सकती है।
निर्यातकों की परेशानी बढ़ेगी
भारतीय निर्यातक लंबे समय से ईरान के साथ कारोबार के लिए दुबई को एक महत्वपूर्ण ट्रेड और पेमेंट हब के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। कई लेनदेन में सामान, भुगतान और शिपिंग की व्यवस्था यूएई के रास्ते मैनेज होती रही है। अब अगर UAE की ओर से ईरान के साथ कारोबार और वित्तीय लेनदेन पर सख्ती बढ़ती है, तो भारतीय कारोबारियों के लिए यह रास्ता मुश्किल हो सकता है। इसका असर सिर्फ भुगतान तक सीमित नहीं रहेगा। माल भेजने में लगने वाला समय, फ्रेट, बीमा और दूसरी लेनदेन लागत भी बढ़ सकती है।
बासमती चावल पर क्यों है खास नजर?
ईरान भारत के बासमती चावल के बड़े बाजारों में से एक है। यही वजह है कि ईरान से जुड़े प्रतिबंधों का असर कृषि निर्यातकों पर भी पड़ सकता है।भारत हर साल करीब 50 से 60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात करता है। इसमें करीब 10 लाख टन के आसपास बासमती ईरान जाता है।
वित्त वर्ष 2026 में भारत के करीब 1.3 अरब डॉलर के ईरान निर्यात में बासमती चावल की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत रही। इसलिए अगर सेकेंडरी प्रतिबंधों की वजह से भुगतान चैनल या शिपिंग व्यवस्था बाधित होती है तो भारत के बासमती निर्यातकों पर सीधा असर पड़ सकता है।
