दुनिया के किसी एक कोने में होने वाला युद्ध कैसे आपकी रसोई तक पहुंच सकता है, इसका ताजा उदाहरण 'एलपीजी' (LPG) के रूप में सामने आया है। ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी युद्ध जैसी स्थिति ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। होर्मुज (Hormuz) की फिर से बंदी ने देश में एक बार फिर एलपीजी को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने नए एलपीजी कनेक्शन जारी करने की प्रक्रिया को फिलहाल के लिए रोक दिया है। अगर आप भी नया गैस कनेक्शन लेने की योजना बना रहे थे, तो आपको अब अनिश्चितकाल के लिए इंतजार करना पड़ सकता है।
यह समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के लिए एक गले की नस (Chokepoint) जैसा है, जहां से दुनिया की 20% ऊर्जा सप्लाई गुज़रती है। भारत के पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि फिलहाल स्थिति सामान्य होने तक नए कनेक्शन नहीं दिए जाएंगे।
आयात पर भारत की भारी निर्भरता
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक देश है। हमारी सालाना 33 मिलियन टन की कुल मांग का लगभग 65% हिस्सा विदेशों से खरीदकर पूरा किया जाता है। इसमें से 90% गैस केवल पश्चिम एशिया के देशों से आती है। चूंकि युद्ध के कारण इस इलाके के समुद्री रास्तों में अनिश्चितता बनी हुई है, इसलिए गैस की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने एक प्रेस ब्रीफिंग में पुष्टि की है कि फिलहाल प्राथमिकता पुराने ग्राहकों को बिना रुके गैस पहुंचाने की है, इसलिए नए कनेक्शनों को 'होल्ड' पर डाल दिया गया है।
पुराने ग्राहकों को प्राथमिकता और बुकिंग पर पाबंदी
गैस की किल्लत न हो, इसके लिए सरकार ने 'राशनिंग' शुरू कर दी है। अब शहरी इलाकों में ग्राहक 25 दिन के अंतराल पर और ग्रामीण इलाकों में 45 दिन के अंतराल पर ही अपना सिलेंडर बुक कर सकते हैं। वितरकों (Distributors) का कहना है कि हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई लिखित आदेश नहीं मिला है, लेकिन ऑनलाइन पोर्टल पर नए कनेक्शन की रिक्वेस्ट स्वीकार नहीं की जा रही है। भारत पेट्रोलियम (BPCL) और अन्य कंपनियों ने सोशल मीडिया पर ग्राहकों को जवाब देते हुए कहा है कि यह स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर है और वे केवल मौजूदा 34 करोड़ परिवारों की ज़रूरतों को पूरा करने पर ध्यान दे रहे हैं।
PNG की ओर बढ़ते कदम
सप्लाई के इस संकट के बीच सरकार एक और बड़ा बदलाव लाने की कोशिश कर रही है। जिन इलाकों में पाइप वाली नेचुरल गैस (PNG) की सुविधा मौजूद है, वहां लोगों को एलपीजी छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक करीब 40,600 परिवारों ने अपने एलपीजी कनेक्शन सरेंडर कर दिए हैं और पीएनजी को अपना लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में करीब 3 करोड़ और ग्राहक पीएनजी की ओर शिफ्ट हो सकते हैं। इससे एलपीजी पर हमारी निर्भरता कुछ कम होगी।
खपत में आई बड़ी गिरावट
सप्लाई की कमी और कमर्शियल (व्यावसायिक) इस्तेमाल पर लगी पाबंदियों का असर आंकड़ों में भी दिख रहा है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के डेटा के अनुसार, देश में एलपीजी की खपत में 15.7% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। जहां पहले खपत 2.82 मिलियन टन थी, वह अब गिरकर 2.38 मिलियन टन रह गई है। हालांकि, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कुछ जगहों पर रजिस्ट्रेशन दोबारा शुरू हुए हैं, लेकिन सिलेंडर की डिलीवरी अब भी ठप है। इसके साथ ही, एक ही घर में दूसरा सिलेंडर (DBC) लेने की सुविधा को भी अभी बंद रखा गया है।
क्या है सरकार की रणनीति?
भारत सरकार स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है। पेट्रोलियम मंत्रालय वैकल्पिक रास्तों और अन्य देशों से एलपीजी आयात की संभावनाओं को तलाश रहा है ताकि खाड़ी देशों पर निर्भरता को कुछ कम किया जा सके। साथ ही, देश के भीतर गैस भंडारण (Storage) क्षमता को बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल तब तक बनी रहेगी जब तक ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में स्थिरता नहीं आती।
