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National Floor Wage: क्या 'वन नेशन, वन वेज' की ओर बढ़ रहा भारत? समझिए सरकार का नया प्लान

नेशनल फ्लोर वेज प्लान के तहत पूरे देश में न्यूनतम मजदूरी तय किए जाने की तैयारी की जा रही है। आखिर सरकार का पूरा प्लान क्या है, क्या 'सरकार वन नेशन वन वेज' की तरफ बढ़ रही है?

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श्रमिकों के बदलेंगे हालात
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Jul 23, 2026, 07:55 IST
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National Floor Wage : क्या भारत में जल्द ऐसा समय आएगा, जब एक ही तरह का काम करने वाले कर्मचारी को देश के किसी भी राज्य में तय न्यूनतम मजदूरी से कम वेतन नहीं मिलेगा? केंद्र सरकार की ओर से National Floor Wage तय करने की शुरुआत ने यही सवाल खड़ा कर दिया है। हालांकि, इसे 'वन नेशन, वन वेज' कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। सरकार पूरे देश में एक जैसी मजदूरी लागू नहीं कर रही, बल्कि पहली बार ऐसी कानूनी न्यूनतम सीमा तय करने जा रही है, जिसके नीचे कोई भी राज्य अपनी न्यूनतम मजदूरी नहीं रख सकेगा। यानी अगर किसी राज्य में पहले से अधिक न्यूनतम मजदूरी लागू है, तो वह जारी रहेगी। लेकिन जहां मजदूरी बहुत कम है, वहां राज्यों को उसे बढ़ाना पड़ सकता है।

आखिर क्या है National Floor Wage?

National Floor Wage एक राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी की कानूनी सीमा होगी। इसे Code on Wages के तहत लागू किया जाएगा। सरकार इसे तय करते समय कई पहलुओं पर विचार करेगी। मसलन, कर्मचारी को न्यूनतम वेतन इतना मिले कि वह अपने परिवार की न्यूनतम जरूरतें पूरी कर पाए। महंगाई से निपट पाए और अलग-अलग राज्यों में जीवनयापन की लागत और भौगोलिक परिस्थितियां को हिसाब से उसे उचित मेहनताना मिले। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर सरकार पूरे देश के लिए एक ही रकम तय करने की बजाय अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग Floor Wage भी तय कर सकती है।

क्या पूरे देश में एक जैसी मजदूरी होगी?

अगर किसी राज्य में न्यूनतम मजदूरी National Floor Wage से ज्यादा है, तो वही मजदूरी लागू रहेगी। मसलन, अगर केंद्र सरकार 500 रुपये प्रतिदिन का Floor Wage तय करती है और किसी राज्य में पहले से 700 रुपये की न्यूनतम मजदूरी लागू है, तो वहां 700 रुपये ही मिलेंगे। लेकिन, जहां मजदूरी 500 रुपये से कम होगी, वहां उसे बढ़ाना पड़ेगा। यानी यह One Nation, One Wage नहीं बल्कि One Nation, One Minimum Benchmark जैसा मॉडल होगा।

सरकार को इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

आज भारत में एक ही तरह का काम करने वाले कर्मचारियों की न्यूनतम मजदूरी राज्यों के हिसाब से काफी अलग है। सबसे बड़ा उदाहरण निर्माण क्षेत्र का है। साल 2023 में नागालैंड में निर्माण मजदूर की न्यूनतम दैनिक मजदूरी लगभग 176 रुपये थी, जबकि तमिलनाडु में यही मजदूरी 856 रुपये प्रतिदिन थी। यानी एक ही काम के लिए मजदूरी में लगभग 5 गुना तक का अंतर। सरकार का मानना है कि ऐसी असमानता कम होनी चाहिए।

Code on Wages से क्या बदलेगा?

Code on Wages चार पुराने श्रम कानूनों को मिलाकर बनाया गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब न्यूनतम मजदूरी का अधिकार केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इसके दायरे में स्थायी कर्मचारी, कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी, अस्थायी कर्मचारी, कैजुअल कर्मचारी और पार्ट-टाइम कर्मचारी सभी आते हैं। यानी करोड़ों असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को भी कानूनी सुरक्षा मिलेगी।

राज्यों की भूमिका खत्म नहीं होगी

National Floor Wage लागू होने के बाद भी राज्यों के पास न्यूनतम मजदूरी तय करने का अधिकार रहेगा। लेकिन वे राष्ट्रीय Floor Wage से नीचे नहीं जा सकेंगे।अगर किसी राज्य में महंगाई ज्यादा है या जीवनयापन महंगा है, तो वहां की सरकार इससे ऊपर मजदूरी तय कर सकती है।

national floor wage

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अलग-अलग Floor Wage क्यों?

Economic Survey 2025-26 बताता है कि सभी राज्यों में महंगाई एक जैसी नहीं है। केरल और लक्षद्वीप में महंगाई लंबे समय तक 6% से ऊपर रही। दिल्ली और हिमाचल प्रदेश में भी महंगाई राष्ट्रीय औसत से अधिक बनी रही। यही वजह है कि सरकार एक समान राशि तय करने की बजाय Regional Floor Wage पर भी विचार कर रही है।

यह विचार नया नहीं है

National Floor Wage का आइडिया पहली बार नहीं आया है। 1991 में National Commission on Rural Labour ने National Floor Level Minimum Wage का सुझाव दिया था। उस समय इसे पहले 35 रुपये प्रतिदिन रखा गया। आखिरी बार 2017 में इसे बढ़ाकर 176 रुपये प्रतिदिन किया गया था।

लेकिन तब यह केवल एक सलाह थी। अब पहली बार इसे कानूनी ताकत मिलने जा रही है।

क्या इससे सैलरी बढ़ जाएगी?

यह जरूरी नहीं है। क्योंकि, जिन राज्यों में पहले से अधिक न्यूनतम मजदूरी है, वहां कोई बदलाव नहीं होगा। लेकिन जहां मजदूरी राष्ट्रीय Floor Wage से कम होगी, वहां उसे बढ़ाना पड़ेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा कम मजदूरी वाले राज्यों के कर्मचारियों को मिल सकता है।

सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा। एक अध्ययन के मुताबिक भारत में कई क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी के नियमों का पालन नहीं होता। कुछ श्रेणियों में उल्लंघन की दर 90% तक पाई गई। ऐसे में National Floor Wage की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्यों और श्रम विभाग द्वारा इसका पालन कितनी सख्ती से कराया जाता है।

आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है?

अगर National Floor Wage लागू होता है, तो देश में पहली बार न्यूनतम मजदूरी की कानूनी राष्ट्रीय सीमा तय होगी। कोई राज्य इससे कम न्यूनतम मजदूरी तय नहीं कर सकेगा। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी। राज्यों के बीच मजदूरी का बहुत बड़ा अंतर धीरे-धीरे कम हो सकता है। हालांकि, पूरे देश में एक समान मजदूरी लागू नहीं होगी।

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