भारतीय शेयर बाजार में करीब 2 महीने से जारी बिकवाली ने निवेशकों के ₹26 लाख करोड़ से ज्यादा साफ कर दिए हैं। Sensex और Nifty लगातार 8वें हफ्ते गिरे हैं। खास बात यह है कि बाजार की इस कमजोरी की वजह अब सिर्फ महंगा क्रूड ऑयल (Crude Oil) नहीं है। बल्कि, US Bond Yield में तेज उछाल के चलते FII की बिकवाली और कमजोर रुपये का दबाव भी है।
यूएस की बॉन्ड यील्ड से हिला शेयर बाजार
पिछले 8 हफ्तों में Sensex करीब 6,590 अंक टूट चुका है, जबकि Nifty में करीब 2,149 अंकों की गिरावट आई है। इस गिरावट से BSE की कुल Market Cap घटकर ₹467 लाख करोड़ से नीचे आ गई। गुरुवार को Sensex एक समय 71,293 तक फिसल गया, जो 52 वीक लो पर है।
क्यों क्रूड से ज्यादा बॉन्ड यील्ड की चिंता?
क्रूड के लिहाज से देंखें, तो यह पूरा साल पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान युद्ध की भेंट चढ़ गया है। अब तक क्रूड ऑयल बाजार के लिए सबसे बड़ा डर बना हुआ था। यहां तक कि ब्रेंट क्रूड मार्च में $120 प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया था। इस महंगे क्रूड ने भारत के आयात बिल को बढ़ाया, महंगाई को बढ़ाया और रुपये पर दबाव बनाया, जिसका असर कंपनियों के तिमाही नतीजों में दिखने लगा है। लेकिन मौजूदा गिरावट में एक बड़ा बदलाव दिखा है। क्रूड में नरमी के बावजूद बाजार लगातार टूट रहा है। ऐसे में अब निवेशकों की नजर अब US Bond Yield पर है।
कितनी हुई बॉन्ड यील्ड?
अमेरिका की 10-Year Treasury Yield हाल में 5.31% तक पहुंच गई, जो 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। इसकेअलावा 30-Year Yield भी 5.65% के पार चली गई। ज्यादा बॉन्ड यील्ड का मतलब है कि अब निवेशकों को सुरक्षित एसेट्स में ज्यादा रिटर्न मिल रहा है। वहीं, इसका एक पहलू यह भी है कि अब निवेशक अमेरिका सरकार को कर्ज देने में कतरा रहे हैं और ऐसा करने के लिए ज्यादा ब्याज वसूलना चाह रहे हैं।
भारतीय बाजार पर यूएस बॉन्ड्स का क्या असर?
Bond Yield बढ़ने से ग्लोबल कैपिटल कॉस्ट बढ़ती है। इसका असर कंपनियों की उधारी की लागत और वैल्यूएशन पर पड़ सकता है। खासकर महंगे वैल्यूएशन वाले और हाई ग्रोथ वाले स्टॉक्स पर ज्यादा दबाव बन सकता है। एक्सपर्ट बता रहे हैं कि क्रूड में आई तेजी कुछ समय के लिए मार्जिन पर दबाव डालती है। लेकिन, बढ़ती बॉन्ड यील्ड मार्केट के लिए ढांचागत चुनौतियां खड़ी करती है। इससे P/E मल्टीपल पर दबाव और भारत जैसे उभरते बाजारों से विदेशी पैसे की निकासी तेज हो जाती है।
