वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली खबर आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को समाप्त करने और शांति बहाली के लिए हुए नए अंतरिम समझौते के तहत ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को वाणिज्यिक जहाजों के लिए फिर से खोल दिया है। इस समझौते के मुताबिक, ईरान अगले 60 दिनों तक इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से कोई ट्रांजिट फीस (Tolls) नहीं वसूलेगा। लेकिन असली पेंच इस 60 दिन की मियाद के बाद का है। ईरान के मुख्य वार्ताकार और शीर्ष अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि 60 दिनों की बातचीत का समय खत्म होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को युद्ध से पहले वाली स्थिति में नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि वहां से गुजरने वाले जहाजों पर 'मैरीटाइम ट्रांजिट फीस' यानी एक तरह का समुद्री टैक्स या टोल टैक्स लगाया जाएगा। आइए जानते हैं ईरान (Iran) का यह पूरा प्लान क्या है और इसका दुनिया तथा भारत पर क्या असर होगा।
क्या है ईरान का नया प्लान?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का ऐसा चोकपॉइंट (Chokepoint) है, जहां से वैश्विक बाजार में बिकने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। हालिया युद्ध के दौरान ईरान ने इस रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा संकट खड़ा हो गया था। अब अमेरिका के साथ हुए 14-सूत्रीय 'इस्लामाबाद समझौते' के बाद, अमेरिकी नौसेना ने ईरान की समुद्री नाकेबंदी (Naval Blockade) हटा ली है और ईरान ने भी अगले 60 दिनों के लिए जहाजों को बिना किसी शुल्क के सुरक्षित रास्ता देने का वादा किया है।
ईरान का प्लान यह है कि इस 60 दिनों की अंतरिम अवधि का इस्तेमाल वह समुद्री रास्तों से बारूदी सुरंगें (Demining Operations) हटाने और सुरक्षा ढांचा तैयार करने के लिए करेगा। लेकिन इसके साथ ही ईरान ने 'पर्सियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी' को एक्टिव कर दिया है। अब इस रास्ते से गुजरने वाले सभी जहाजों को ईरान के बनाए कॉरिडोर एडमिनिस्ट्रेशन से पहले मंजूरी लेनी होगी और उनके तय शेड्यूल के हिसाब से चलना होगा। 60 दिन बाद, ईरान इस रास्ते पर अपनी संप्रभुता (Sovereignty) का हवाला देते हुए पर्यावरण संरक्षण, सुरक्षा प्रबंधन और नौवहन सेवाओं के नाम पर हर गुजरने वाले कमर्शियल जहाज और तेल टैंकर से मोटी फीस वसूलना शुरू करने की तैयारी में है।
MoU का 5वां पॉइंट क्या है?
5वें पॉइंट में तीन बड़ी बातें हैं, जो होर्मुज का भविष्य तय करेंगी. पहली- यह पॉइंट कहता है कि 'MoU पर साइन होने के बाद कमर्शियल जहाज बिना किसी टोल के सिर्फ 60 दिनों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान सागर और ओमान सागर से फारस की खाड़ी तक आ-जा सकेंगे।' इस लाइन का मतलब तो यही हुआ कि 60 दिन तक होर्मुज से गुजरने वाले रास्तों पर कोई टोल नहीं लगाया जाएगा। इसी पॉइंट में दूसरी बड़ी बात यह है- 'जहाजों की आवाजाही तुरंत शुरू हो जाएगी, लेकिन रास्ते में जो टेक्निकल और मिलिट्री रुकावटें हैं और बारूदी सुरंगे हैं, उन्हें ईरान 30 दिन में हटाएगा।'
जंग के दौरान ईरान ने समुद्री रास्ते में जगह-जगह माइंस बिछा दी थीं. इन्हें हटाने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है. और तीसरी बड़ी बात जो काफी अहम है, वह है- 'ईरान ओमान के साथ बातचीत करेगा और तय करेगा कि होर्मुज स्ट्रेट का आगे का मैनेजमेंट कैसे होगा। इसमें फारस की खाड़ी से सटे देशों के साथ भी चर्चा होगी. सब कुछ अंतरराष्ट्रीय कानून और होर्मुज के तटीय देशों के संप्रभु अधिकारों को ध्यान में रखकर होगा.' 60 दिन बाद ईरान और ओमान मिलकर तय करेंगे कि होर्मुज से जहाज कैसे गुजरेंगे. यानी, दोनों चाहेंगे तो टोल देना होगा।
वैश्विक बाजार और शिपिंग कंपनीज पर इसका क्या असर होगा?
ईरान के इस कदम से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग इंडस्ट्री (Shipping Industry) और तेल कारोबारियों के बीच भारी चिंता का माहौल बन गया है। अब तक होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र (International Waterway) माना जाता था, जहां से सभी देशों के जहाज बिना कोई टैक्स दिए स्वतंत्र रूप से गुजरते थे।
- अगर ईरान 60 दिनों के बाद अनिवार्य रूप से टोल टैक्स वसूलना शुरू करता है, तो खाड़ी देशों (जैसे सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और इराक) से निकलने वाले कच्चे तेल की ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट काफी बढ़ जाएगी। शिपिंग कंपनियों को यह अतिरिक्त खर्च उठाना होगा, जिसका सीधा बोझ ग्राहकों पर पड़ेगा।
- ईरान के इस प्लान का सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे बड़े तेल उत्पादक देश कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि युद्ध से पहले यह रास्ता पूरी तरह मुफ्त था और इसे पुराने नियमों पर ही चलाया जाना चाहिए। ईरान का यह कदम खाड़ी देशों के आर्थिक हितों को चोट पहुंचा सकता है, जिससे क्षेत्रीय तनाव एक बार फिर सुलग सकता है।
- इस समझौते के बाद कच्चे तेल की कीमतें फिलहाल तीन महीने के निचले स्तर (लगभग 78 डॉलर प्रति बैरल) पर आ गई हैं, जिससे दुनिया को बड़ी राहत मिली है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 60 दिन बाद ईरान ने टैक्स वसूली की जिद पर अड़कर जहाजों को रोकना शुरू किया, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर आसमान छू सकती हैं।
भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, और इसमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी होर्मुज के रास्ते से होकर भारत के बंदरगाहों तक पहुंचता है।
- अगर ईरान इस रास्ते पर ट्रांजिट फीस लागू कर देता है, तो भारत के लिए खाड़ी देशों से तेल मंगाना महंगा हो जाएगा। भले ही कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता रहे, लेकिन भारत तक उसे लाने का समुद्री भाड़ा (Freight Charges) बढ़ जाएगा।
- समुद्री भाड़ा बढ़ने से देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) की कीमतों पर दोबारा दबाव बढ़ सकता है, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई को काबू में रखने की सरकार की कोशिशों को झटका लग सकता है।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका और ईरान के बीच शुरू होने वाली इस 60 दिनों की मैराथन वार्ताओं पर टिकी हैं। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों को टोल-फ्री होना चाहिए और अमेरिका इस रास्ते को दोबारा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए रुकावट नहीं बनने देगा। अब देखना यह होगा कि क्या अगले दो महीनों में कूटनीति के जरिए ईरान को इस टैक्स वसूली के प्लान से पीछे हटने के लिए राजी किया जा सकता है, या फिर 60 दिन बाद समंदर में एक नया विवाद खड़ा होगा।
