पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव अब चरम पर पहुंच गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराने का दावा किया है, जिसके जवाब में पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा कर दी है। हालांकि यह संघर्ष दो देशों के बीच है, लेकिन इसकी तपिश भारतीय कंपनियों तक भी पहुंच रही है। भारत ने पिछले ढाई दशकों में अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और विकास में अरबों डॉलर का निवेश किया है। अब युद्ध के इस माहौल में भारतीय कंपनियों के प्रोजेक्ट्स और वहां फंसे निवेश पर काले बादल मंडराने लगे हैं।
अफगानिस्तान में भारत का निवेश पोर्टफोलियो
भारत ने पिछले 25 वर्षों में अफगानिस्तान के विकास में लगभग 3 अरब डॉलर (करीब 27 हजार करोड़ रुपये)से अधिक का निवेश किया है। भारत की भागीदारी केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांतों में भारत ने 500 से ज्यादा छोटी-बड़ी विकास परियोजनाओं को अंजाम दिया है। इनमें स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। भारत ने वहां की नई संसद भवन का निर्माण भी कराया है, जो दोनों देशों की दोस्ती का प्रतीक मानी जाती है। इसके अलावा काबुल में बिजली सप्लाई सुधारने के लिए पावर ट्रांसमिशन लाइन बिछाने में भी भारत की बड़ी भूमिका रही है।
इन प्रमुख प्रोजेक्ट्स पर टिका है भारत का पैसा
भारत के कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स सीधे तौर पर इस युद्ध की मार झेल सकते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है जरंज-देलाराम हाईवे (Zaranj-Delaram Highway), जिसकी लंबाई 218 किलोमीटर है और इसे बनाने में भारत ने 15 करोड़ डॉलर खर्च किए हैं। यह सड़क सामरिक रूप से बहुत खास है क्योंकि यह चाबहार पोर्ट से कनेक्टिविटी प्रदान करती है। इसी तरह हेरात प्रांत में स्थित सलमा डैम (अफगान-भारत मैत्री बांध)पर भारत ने 29 करोड़ डॉलर लगाए हैं, जिससे 42 मेगावाट बिजली पैदा होती है। युद्ध की स्थिति में इन संपत्तियों को नुकसान पहुंचने का सीधा अर्थ है भारत के करोड़ों रुपये का डूबना।
किन कंपनियों की बढ़ी धड़कनें?
युद्ध के इस माहौल में सबसे ज्यादा चिंता निजी और सरकारी कंपनियों को लेकर है। भारत की दिग्गज दवा कंपनी जायडस लाइफसाइंसेज (Zydus Lifesciences)ने पिछले साल ही अफगानिस्तान के रऊफी इंटरनेशनल ग्रुप के साथ करीब 900 करोड़ रुपये (10 करोड़ डॉलर) का समझौता किया था। इस योजना के तहत जायडस को वहां दवाओं का निर्यात करना था और भविष्य में स्थानीय स्तर पर उत्पादन शुरू करना था। युद्ध छिड़ने से सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित होगी, जिससे जायडस को सबसे तगड़ा झटका लग सकता है।
दूसरी ओर, सरकारी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL)के नेतृत्व वाले समूह ने हाजीगाक लौह अयस्क खदान (Hajigak Iron Ore Mine) में निवेश की बड़ी योजना बनाई थी। इस प्रोजेक्ट की कुल लागत करीब 10 अरब डॉलर (90 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा) आंकी गई थी, जिसमें स्टील प्लांट और पावर प्लांट भी शामिल थे। हालांकि यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरणों और बातचीत के दौर में था, लेकिन युद्ध की स्थिति इस विशाल निवेश को सालों पीछे धकेल सकती है।
