Hormuz Closure Impact on India: अतीत में पश्चिम एशिया यानी गल्फ देशों के संकट का असर भारत के फ्यूल पंप पर दिखता था। लेकिन, इस बार जोखिम व्यापक है। क्योंकि ईरान की मौजूदा सत्ता अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
लंबा खिंचा युद्ध तो बढ़ेगा संकट
इस बार ईरान हर उस देश को निशाना बना रहा है, जो किसी भी तरह से उसके खिलाफ या अमेरिका के साथ है। ऐसे में दर्जनों खाड़ी देश सीधे तौर पर इस जंग का हिस्सा बन चुके हैं, जिनके भारत के साथ गहरे कारोबारी रिश्ते हैं और लाखों भारतीय वहां काम करते हैं।
इसके अलावा ईरान ने होर्मुज को बंद कर दिया है, जिसकी वजह से ग्लोबल ऑयल एंड गैस की सप्लाई को बड़ा झटका लगा है। इसकी वजह से क्रूड ऑयल के दाम 60 से बढ़कर सीधे 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं। वहीं, नैचुरल गैस के दाम भी 45 से 50 फीसदी तक बढ़ गए हैं। हालांकि, इस बार भारत के लिए ऊर्जा सप्लाई के अलावा और भी खतरे हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात के लिहाज से यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) अमेरिका के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा मार्केट है। UAE सीधे तौर पर इस जंग की चपेट में है। दुबई और अबू धाबी भारतीय संपन्न वर्ग के निवेश हब हैं, जबकि पर्शियन गल्फ में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं, जिनकी रेमिटेंस घरेलू खपत और चालू खाते के लिए अहम है।
पहला मोर्चा
होर्मुज और करंट अकाउंट का दबाव : Strait of Hormuz से भारत का लगभग आधा ऊर्जा आयात गुजरता है। अगर यहां लंबा अवरोध आता है, तो इसका सीधा असर देश के चालू खाते पर आएगा, क्योंकि भारत को दूसरे स्रोतों से महंगा आयात करना पड़ेगा, जिससे चालू खाता घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़ सकता है। इसके अलावा भारत की तरफ से UAE व दूसरे खाड़ी देशों को किए जाने वाले निर्यात पर भी असका असर पड़ेगा। दुबई के Jebel Ali Port पर हमलों के बाद शिपिंग, फ्रेट और बीमा लागत बढ़ने से इस खतरे को लेकर चेतावनी पहले ही मिल चुकी है।
दूसरा मोर्चा
रुपया, महंगाई और ब्याज दर : रुपया पिछले दो वर्षों में डॉलर के मुकाबले 9% गिरकर करीब 91.5 पर है। पिछले एक वर्ष में रुपया डॉलर के मुकाबले एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में रहा है। अगर यह 100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब पहुंचता है और तेल 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर भागता है, तो देश में महंगाई बेकाबू हो सकती है। इसकी वजह से आखिर में रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं।
तीसरा मोर्चा
सोना और फिस्कल जोखिम : यूक्रेन युद्ध के बाद से सोने के दाम में तीन गुना तक बढ़ोतरी हो चुकी है। भारतीय परिवार भी सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की ओर मुड़ रहे हैं। लेकिन 2015 में जारी गोल्ड-लिंक्ड बॉन्ड्स के तहत सरकार पर लगभग अब भी करीब 124 टन सोने यानी करीब 2 लाख करोड़ रुपये की देनदारी है, जिनकी मैच्योरिटी 2032 तक है। ऐसे में सोने की बढ़ती कीमतें देश के फिस्कल गणित बिगाड़ सकती हैं।
चौथा मोर्चा
खाद सुरक्षा और सब्सिडी का बोझ : Qatar से आने वाली LNG घरेलू उर्वरक संयंत्रों के लिए जरूरी फीडस्टॉक है। उत्पादन में रुकावट से खाद आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सरकार के सामने 19 अरब डॉलर की खाद सब्सिडी और बढ़ाने या किसानों की नाराजगी झेलने का कठिन विकल्प होगा। जबकि कई राज्यों में चुनाव भी हैं।
पांचवां मोर्चा
पूंजी प्रवाह और कूटनीतिक संतुलन : पाम जुमेराह जैसे इलाकों में निवेश रखने वाले भारतीय परिवार अब सिंगापुर और हांगकांग की ओर रुख कर सकते हैं। खाड़ी के सॉवरेन वेल्थ फंड भी निवेश प्राथमिकताएं टाल सकते हैं। दूसरी ओर, वॉशिंगटन के साथ व्यापार समीकरण में ढील न मिलने पर रूस से तेल आयात पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे टैरिफ जोखिम भी उभरता है।
आम आदमी पर दोहरी मार
यह संकट भारत के लिए बहु-आयामी है। तेल, रुपया, रेमिटेंस, सोना, खाद और पूंजी प्रवाह सभी पर असर। यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो इसका नतीजा होगा महंगाई और बढ़ी हुई ब्याज दर। इससे पूंजी-लागत बढ़ेगी, जिसका इकोनॉमिक ग्रोथ पर सीधा असर होगा। इस तरह महंगाई और महंगी ब्याज दर मिलकर आम आदमी के जेब पर डबल अटैक कर सकते हैं।
