शेयर बाजार ने पिछले दो साल से निवेशकों को निराश किया है। इसके बावजूद हर महीने हजारों करोड़ रुपये SIP के जरिये म्यूचुअल फंड स्कीम में निवेश हो रहे हैं। यानी आम निवेशकों का भरोसा म्यूचुअल फंड स्कीम पर बना हुआ है। हालांकि, अब निवेशक अब म्यूचुअल फंड निवेश से पहले स्कीम की जानकारी जरूर जुटा रहे हैं। उनकी कोशिश अपने वित्तीय गोल के अनुसार सही म्यूचुअल फंड स्कीम चुनने में है। बता दें कि भारत में 2,500 से ज्यादा म्यूचुअल फंड स्कीम उपलब्ध हैं। इसलिए यह काम इतना आसान नहीं है। अगर आप भी म्यूचुअल फंड स्कीम में निवेश करना चाहते हैं तो हम आपको बता रहे हैं कि आप अपने लिए सही म्यूचुअल फंड स्कीम का चुनाव कैसे कर सकते हैं।
सही म्यूचुअल फंड कैसे चुनें?
सबसे पहले इन गलतियों से बचें
फाइनेंशियल एक्सपर्ट का कहना है कि ज्यादातर निवेशक सिर्फ ऐप पर स्टार रेटिंग या पिछले 12 महीनों में मिले सबसे ज्यादा रिटर्न को देखकर फैसला करने की गलती कर बैठते हैं। लेकिन, पिछला परफॉर्मेंस हमेशा रिटर्न का पैमाना नहीं होता। सही म्यूचुअल फंड का चयन करने में कई बातों का ख्याल रखना जरूरी होता है।
तुलना करने से पहले SEBI की कैटेगरी समझें
अगर आप किसी दो म्यूचुअल फंड स्कीम की तुलना करना चाहते हैं तो सबसे हपले गलत फंड्स की तुलना न करें (जैसे स्मॉल-कैप की तुलना हाइब्रिड फंड से करना)। आकपेा म्यूचुअल फंड के बीच तुलना करने से पहले सेबी की कैटोगरी समझना चाहिए। अगर आप 3 साल के लिए निवेश करना चाहते हैं तो डेट या हाइब्रिड फंड चुनें। 10 साल या उससे अधिक के वेल्थ क्रिएशन के लिए इक्विटी फंड सही होगा। म्यूचुअल फंड रिटर्न पर एक्सपेंस रेश्यो की गणना जरूरी करें। कम एक्सपेंस रेश्यो के लिए हमेशा डायरेक्ट प्लान चुनें।
दो फंड्स की तुलना में लगाएं ये 4 फिल्टर
- एक्सपेंस रेश्यो: सालाना मैनेजमेंट फीस जितनी कम होगी, लंबी अवधि में कंपाउंडिंग का फायदा उतना ही ज्यादा होगा।
- पोर्टफोलियो ओवरलैप: ऑनलाइन टूल से चेक करें कि दोनों फंड्स समान शेयरों में ही निवेश तो नहीं कर रहे हैं।
- रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न (शार्प रेश्यो): ज्यादा शार्प रेश्यो का मतलब है कम उतार-चढ़ाव में बेहतर रिटर्न।
- AUM व एग्जिट लोड: स्मॉल-कैप में बहुत ज्यादा AUM रुकावट बन सकता है। 1 साल के भीतर निकलने पर आमतौर पर 1% एग्जिट लोड लगता है।
समीक्षा और रीबैलेंसिंग को जानें
जिस भी म्यूचुअल फंड में निवेश करें उसको साल में केवल एक बार रिव्यू जरूर करें। अगर फंड लगातार 18-24 महीनों तक अपने बेंचमार्क (जैसे Nifty 50) से खराब प्रदर्शन करे, तभी बाहर निकलें। बाजार के उतार-चढ़ाव के बाद अपने तय एसेट एलोकेशन (जैसे 60% इक्विटी, 40% डेट) को दोबारा संतुलित करें।
