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अमेरिका की भौकाल कारों पर देश में कितना लगता है टैक्स, जानें असली कीमत से कितने गुणे ज्यादा भरने पड़ते हैं पैसे

भारत में टेस्ला की एंट्री अब हो गई है। उसकी मॉडल Y की कीमतों में बड़ा अंतर सामने आया है। भारत में इसकी कीमत 60 लाख रुपये है, जबकि अमेरिका में 37.5 लाख रुपये और चीन में 29.9 लाख रुपये है।

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भारत में टेस्ला कार (फोटो: PTI)

नई दिल्ली: भारत में टेस्ला की एंट्री अब हो गई है। उसकी मॉडल Y की कीमतों में बड़ा अंतर सामने आया है। भारत में इसकी कीमत 60 लाख रुपये है, जबकि अमेरिका में 37.5 लाख रुपये और चीन में 29.9 लाख रुपये है। भारत में इतनी ज़्यादा कीमत होने की मुख्य वजह 100% इंपोर्ट ड्यूटी है, जिसका मकसद स्थानीय ऑटो उद्योग की रक्षा करना और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है।

टेस्ला के आधिकारिक तौर पर भारत में आने के साथ ही, ध्यान अब इसकी मॉडल वाई की कीमत और संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन में इसकी कीमत से तुलना पर केंद्रित हो गया है। भारत में, एलन मस्क की टेस्ला कारों की कीमत 60 लाख रुपये है, जो चीन में इसकी कीमत से लगभग दोगुनी है। वजह साफ है कि भारत द्वारा अमेरिका से आयातित लक्जरी कारों पर लगाया जाने वाला आयात शुल्क।

लग्जरी कारों पर भारी टैरिफ

मॉडल वाई की शुरुआती कीमत अमेरिका में $44,990 (लगभग 37.5 लाख रुपये) है, जबकि चीन में इसकी कीमत लगभग ¥263,500 यानी 29.9 लाख रुपये है। जर्मनी में, टेस्ला कार की कीमत (€45,970 यानी 45.6 लाख रुपये) है।

इम्पोर्टेड कारों पर इतना ज़्यादा टैरिफ़ क्यों?

भारत अपने घरेलू ऑटोमोबाइल उद्योग की सुरक्षा, व्यापार घाटे को कम करने और स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका जैसे देशों से इम्पोर्टेड कारों पर 100% तक का भारी टैरिफ़ लगाता है। इम्पोर्ट ड्यूटी टेस्ला जैसी वैश्विक ऑटोमोबाइल कंपनियों को सरकार की "मेक इन इंडिया" पहल के तहत भारत में उत्पादन या असेंबली यूनिट स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करती है। हालांकि इस तरह के शुल्क विदेशी लग्जरी कारों को महंगा बनाते हैं, लेकिन इनका उद्देश्य रणनीतिक रूप से घरेलू ब्रांडों को बढ़ावा देना और यह सुनिश्चित करना है कि भारत केवल विदेशी निर्मित वाहनों के लिए डंपिंग ग्राउंड न बने।

भारी टैरिफ़ अभी भी एक बाधा

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक 40,000 डॉलर से ऊपर की कीमत वाली पूरी तरह से निर्मित इकाइयों (सीबीयू) पर 100% तक और उससे कम कीमत वाली इकाइयों पर 70% तक इम्पोर्ट ड्यूटी लगाता है। टेस्ला के सीएफओ ने माना है कि इस तरह के हाई टैरिफ़ ग्राहकों के लिए चिंता पैदा करते हैं । ऐसा लगता है कि एलन मस्क अब भविष्य के भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर दांव लगा रहे हैं, हालांकि वाशिंगटन के साथ तनाव टेस्ला की योजनाओं के लिए देरी का सबब बन सकती है।

टेस्ला ने मुंबई में खोला अपना पहला ‘एक्सपीरियंस सेंटर’

समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक टेस्ला ने मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स में अपना पहला ‘एक्सपीरियंस सेंटर’ खोला है। टेस्ला अमेरिका के अरबपति कारोबारी एलन मस्क के स्वामित्व वाली कंपनी है। मस्क ने इससे पहले उच्च आयात शुल्क को कंपनी के भारत में नहीं आने की वजह बताया था। मध्यम आकार की इलेक्ट्रिक एसयूवी ‘वाई’ कभी दुनिया की सबसे ज़्यादा बिकने वाली कार थी और यह भारत में दो संस्करणों में उपलब्ध होगी। रियर व्हील ड्राइव की शुरुआती कीमत 59.89 लाख रुपये है और लंबी दूरी की रियर व्हील ड्राइव की शुरुआती कीमत 67.89 लाख रुपये है। दोनों संस्करणों की आपूर्ति क्रमश: 2025 की तीसरी और चौथी तिमाही में शुरू होने की उम्मीद है। कंपनी ने कहा कि शुरुआत में पंजीकरण और आपूर्ति दिल्ली, मुंबई और गुरुग्राम में होगी। रियर व्हील ड्राइव संस्करण की रेंज 500 किलोमीटर है, जबकि लंबी दूरी के रियर व्हील ड्राइव संस्करण को एक बार चार्ज करके 622 किलोमीटर तक चलाया जा सकता है। (भाषा इनपुट)

Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

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