आज के समय में हेल्थ इंश्योरेंस लेना जरूरी हो गया है, क्योंकि इलाज का खर्च तेजी से बढ़ रहा है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस का इस्तेमाल सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने पर ही किया जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है। कई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में अस्पताल के बिल के अलावा इलाज से जुड़े कुछ दूसरे खर्च भी कवर किए जाते हैं। इनमें अस्पताल में भर्ती होने से पहले की जांच, डॉक्टर की फीस, दवाइयां और डिस्चार्ज के बाद होने वाले कुछ मेडिकल खर्च शामिल हो सकते हैं। हालांकि, हर पॉलिसी में ये सुविधाएं एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए बीमा खरीदते समय उसकी शर्तें ध्यान से पढ़ना जरूरी है।
Health Insurance सिर्फ अस्पताल का बिल नहीं भरता!
अस्पताल में भर्ती होने पर कौन-से खर्च मिलते हैं?
हेल्थ इंश्योरेंस का सबसे अहम हिस्सा अस्पताल में भर्ती होने पर मिलने वाला कवर है। पॉलिसी की शर्तों के अनुसार इसमें कमरे का किराया, डॉक्टर और सर्जन की फीस, दवाइयां, जांच, ऑपरेशन थिएटर और इलाज से जुड़े अन्य योग्य खर्च शामिल हो सकते हैं। कुछ पॉलिसी में डे-केयर ट्रीटमेंट भी कवर होता है। ऐसे इलाज के लिए मरीज को 24 घंटे अस्पताल में भर्ती रहने की जरूरत नहीं होती। हालांकि, इलाज पॉलिसी में शामिल होना चाहिए और तय नियमों का पालन होना जरूरी है।
अस्पताल में भर्ती होने से पहले के खर्च
कई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में अस्पताल में भर्ती होने से पहले किए गए मेडिकल टेस्ट, डॉक्टर की सलाह और दवाइयों का खर्च भी मिल सकता है। इसे प्री-हॉस्पिटलाइजेशन खर्च कहा जाता है। उदाहरण के लिए, अगर डॉक्टर किसी बीमारी के कारण खून की जांच, स्कैन या दूसरी जांच कराने को कहते हैं और उसके बाद मरीज को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है, तो ये खर्च पॉलिसी की शर्तों के अनुसार कवर हो सकते हैं। इसके लिए जांच और इलाज का भर्ती होने वाली बीमारी से जुड़ा होना जरूरी है। साथ ही, पॉलिसी में दी गई समय-सीमा का ध्यान रखना चाहिए।
डिस्चार्ज के बाद भी मिल सकता है पैसा
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी मरीज को दवाइयों, फॉलो-अप डॉक्टर विजिट और मेडिकल टेस्ट की जरूरत पड़ सकती है। कुछ पॉलिसी में ऐसे खर्चों को पोस्ट-हॉस्पिटलाइजेशन कवर के तहत शामिल किया जाता है। यह सुविधा एक तय अवधि तक ही मिलती है। इसलिए पॉलिसी खरीदने से पहले जांच लें कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद कितने दिनों तक के खर्च कवर होंगे और क्लेम के लिए कौन-से बिल या दस्तावेज जमा करने होंगे।
हर मेडिकल खर्च का भुगतान नहीं करती बीमा कंपनी
यह समझना जरूरी है कि हेल्थ इंश्योरेंस होने का मतलब यह नहीं है कि हर मेडिकल बिल का पूरा पैसा मिल जाएगा। नियमित डॉक्टर से सलाह, अस्पताल में भर्ती हुए बिना ली गई दवाइयां और जांचें तभी कवर हो सकती हैं, जब पॉलिसी में OPD यानी आउट पेशेंट ट्रीटमेंट की सुविधा हो। इसी तरह, चश्मे, सुनने की मशीन, सामान्य डेंटल इलाज और कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं जैसे खर्च कई पॉलिसी में शामिल नहीं होते या उन पर विशेष शर्तें लागू होती हैं। पहले से मौजूद बीमारियों पर वेटिंग पीरियड भी हो सकता है।
पॉलिसी खरीदने से पहले किन बातों का रखें ध्यान?
हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय सिर्फ सम इंश्योर्ड और प्रीमियम देखकर फैसला न करें। यह भी जांचें कि कमरे के किराए की सीमा, को-पेमेंट, डिडक्टिबल, बीमारी के हिसाब से सब-लिमिट और वेटिंग पीरियड क्या हैं। को-पेमेंट होने पर इलाज के योग्य खर्च का एक हिस्सा आपको खुद देना पड़ सकता है। पॉलिसी की कस्टमर इन्फॉर्मेशन शीट और नियमों को पढ़ें तथा अपनी पुरानी बीमारियों की सही जानकारी दें। जरूरत पड़ने पर बीमा कंपनी से लिखित में स्पष्टीकरण लें। इससे क्लेम के समय अनचाहे खर्च और परेशानी से बचने में मदद मिल सकती है।
