हेल्थ इंश्योरेंस आज के समय में हर परिवार की वित्तीय सुरक्षा का एक अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन पॉलिसी के नियमों और दावों के भुगतान के दौरान आने वाली बारीकियां अक्सर आम आदमी को मुश्किल में डाल देती हैं। खासकर मातृत्व (maternity) और प्रेगनेंसी से जुड़े मामलों में इंश्योरेंस कंपनियों के नियम काफी सख्त माने जाते हैं। सामान्य तौर पर अधिकांश रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों में प्रेगनेंसी और उससे जुड़े खर्चों या कॉम्प्लिकेशन को कवर नहीं किया जाता है, जब तक कि पॉलिसी में विशेष रूप से मैटरनिटी राइडर या ऐड-ऑन शामिल न हो। हालांकि, एक बड़ा असमंजस तब पैदा होता है जब कोई महिला प्रेगनेंसी के दौरान किसी ऐसी बीमारी या संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती होती है, जिसका सीधा संबंध गर्भावस्था से नहीं होता है। ऐसे मामलों में भी कई बार इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम खारिज करने का जोखिम उठाती हैं, जिससे पॉलिसीधारकों को भारी मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
प्रेगनेंसी के दौरान अस्पताल में भर्ती होने पर भी खारिज हो सकता है हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम, जानें क्या हैं नियम
प्रेग्नेंसी का खर्चा कौन उठाएगा ?
जब कोई महिला नौ महीने की गर्भावस्था के दौर से गुजर रही होती है, तो उसे अन्य सामान्य लोगों की तरह वायरल इन्फेक्शन, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्या, टाइफाइड या अन्य असंबंधित बीमारियां हो सकती हैं। कागजों और मेडिकल भाषा में इसे 'ओवरलैपिंग सिचुएशन' कहा जाता है, जहां प्रेगनेंसी के साथ-साथ कोई अन्य मेडिकल कंडिशन भी शरीर में आ जाती है। इस तरह के मामलों में सबसे बड़ा विवाद इस बात पर होता है कि अस्पताल में भर्ती होने की मुख्य वजह क्या थी। कई बार इंश्योरेंस कंपनियां और उनके मेडिकल पैनल यह तर्क देते हैं कि चूंकि मरीज गर्भवती है, इसलिए बीमारी या उसके लक्षण प्रेगनेंसी से जुड़े हो सकते हैं या उससे प्रभावित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी गर्भवती महिला को गंभीर उल्टी या पेट का संक्रमण (गैस्ट्रोएन्टेरिटिस) हो जाए, तो कंपनियां इसे हाइपरमेसिस ग्रेविडेरम (Hyperemesis Gravidarum - गर्भावस्था से जुड़ा गंभीर उल्टी का विकार) से जोड़कर देखने लगती हैं और पॉलिसी के मैटरनिटी एक्सक्लूजन का हवाला देकर क्लेम को खारिज कर देती हैं।
क्या-क्या है नियम?
इस तरह के दावों के विवाद में सबसे अहम भूमिका अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड्स और डिस्चार्ज समरी की होती है। जानकारों का कहना है कि बीमा कंपनियां पॉलिसी के नियमों के साथ-साथ डॉक्टर के नोट्स, डायग्नोसिस रिपोर्ट और मुख्य बीमारी के कारण की बारीकी से जांच करती हैं। यदि डिस्चार्ज समरी में बीमारी का कारण स्पष्ट नहीं है या डॉक्टर की शब्दावली में थोड़ा भी असमंजस रहता है, तो इंफॉर्मर या बीमा कंपनी इसे गर्भावस्था की जटिलता मानकर भुगतान से इनकार कर सकती है। हालांकि, उपभोक्ता अदालतों और जिला उपभोक्ता आयोग के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि बीमारी पूरी तरह से स्वतंत्र है और उसका प्रेगनेंसी की किसी जटिलता से सीधा लेना-देना नहीं है, तो केवल मरीज के गर्भवती होने मात्र से असंबंधित बीमारी के क्लेम को खारिज नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद, अदालती चक्करों से बचने के लिए यह बेहद जरूरी है कि अस्पताल से डिस्चार्ज होते समय मरीज अपनी मेडिकल रिपोर्ट और डिस्चार्ज समरी की अच्छी तरह जांच कर लें।
मेडिकल एमर्जेन्सी का खर्चा कौन उठाएगा?
पॉलिसीधारकों को ऐसी किसी भी अप्रत्याशित परिस्थिति से बचने के लिए हमेशा अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के नियम, एक्सक्लूजन और वेटिंग पीरियड को ध्यान से पढ़ना चाहिए। यदि किसी स्टैंडर्ड पॉलिसी में मैटरनिटी बेनिफिट नहीं है, तो यह समझना जरूरी है कि गर्भावस्था के दौरान होने वाले सामान्य खर्च तो कवर नहीं होंगे, लेकिन यदि कोई बिल्कुल अलग और असंबंधित मेडिकल इमरजेंसी आती है, तो उसके पेपर्स एकदम स्पष्ट होने चाहिए। अस्पताल के दस्तावेजों में मुख्य डायग्नोसिस (Principal Diagnosis) में यह साफ दिखना चाहिए कि इलाज किस बीमारी का चल रहा है। यदि अस्पताल के रिकॉर्ड में कोई तथ्यात्मक गलती है, तो तुरंत डॉक्टर या अस्पताल प्रशासन से कहकर उसमें सुधार करवाना चाहिए ताकि बीमा कंपनी को क्लेम रिजेक्ट करने का कोई मौका न मिले। सतर्कता और सही कागजी कार्रवाई के जरिए इस तरह के दावों के विवादों से काफी हद तक बचा जा सकता है।
