भारत में सोने की मांग हमेशा ऊंचाइयों पर रहती है, लेकिन अब सरकार ने इसके आयात (Import) को लेकर नियमों में बड़ी तब्दीली की है। वाणिज्य मंत्रालय ने विदेशों से आने वाले सोने पर लगाम कसते हुए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नए नियमों के मुताबिक, सरकार ने ड्यूटी-फ्री (सीमा शुल्क मुक्त) सोने के आयात की एक सीमा तय कर दी है। अब कोई भी एजेंसी या इकाई अपनी मनमर्जी से असीमित मात्रा में सोना विदेश से नहीं ला सकेगी। इस कदम का मुख्य उद्देश्य देश के व्यापार घाटे को कम करना और घरेलू बाजार में सोने की अवैध आवाजाही को रोकना है।
क्या है नया नियम और 100 किलो की लिमिट?
सरकार द्वारा जारी नई अधिसूचना के अनुसार, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) और कुछ विशिष्ट एजेंसियों के लिए सोने के आयात की मात्रा को सीमित कर दिया गया है। पहले कई एजेंसियां भारी मात्रा में बिना किसी कड़ी पाबंदी के सोना लाती थीं, लेकिन अब इसे प्रति वर्ष या प्रति खेप (Consignment) के हिसाब से नियंत्रित किया जाएगा। विशेष रूप से, कुछ रियायती नियमों के तहत आने वाले गोल्ड इम्पोर्ट को 100 किलो तक सीमित करने की चर्चा है। इससे ज्यादा आयात करने के लिए अब विशेष अनुमति और अतिरिक्त कागजी कार्रवाई की जरूरत होगी।
आखिर सरकार ने क्यों उठाया यह कदम?
भारत अपनी सोने की जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसके लिए देश को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा (डॉलर) खर्च करनी पड़ती है। जब सोने का आयात बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो देश का 'करंट अकाउंट डेफिसिट' (CAD) यानी व्यापार घाटा भी बढ़ जाता है, जिससे भारतीय रुपया कमजोर होने लगता है। सरकार चाहती है कि लोग सोने के भौतिक रूप (Physical Gold) के बजाय डिजिटल गोल्ड या 'सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड' में निवेश करें। इसके अलावा, आयात के नियमों में ढील का फायदा उठाकर कुछ लोग टैक्स चोरी और स्मगलिंग को बढ़ावा दे रहे थे, जिस पर लगाम कसना जरूरी हो गया था।
एक्सपर्ट का क्या है कहना?
कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के अनुसार, भारत सरकार ने 14 मई 2026 से 'एडवांस ऑथराइजेशन' (AA) स्कीम के तहत बिना ड्यूटी (टैक्स-फ्री) सोना आयात करने के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब इस स्कीम के तहत एक लाइसेंस पर अधिकतम 100 किलो सोना ही मंगाया जा सकेगा। यह पाबंदी उन रत्न और आभूषण निर्यातकों पर लागू होगी जो कच्चा सोना आयात करते हैं और उसे तराश कर या गहने बनाकर वापस विदेश भेजते हैं। सरकार का मुख्य उद्देश्य देश के बढ़ते आयात बिल को कम करना और विदेशी मुद्रा बचाना है।
नए नियमों के मुताबिक, अब ज्वेलरी निर्माताओं के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे नया लाइसेंस पाने से पहले अपनी पिछली निर्यात जिम्मेदारियों (Export Obligations) का कम से कम 50% हिस्सा पूरा करें। विशेषज्ञों का मानना है कि इस सख्त कदम का असर वैश्विक स्तर पर सोने की मांग पर पड़ेगा। मांग में कमी आने की संभावना है, जिससे आने वाले समय में सोने की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिल सकती है।
क्या बढ़ेगी देश में गोल्ड की किल्लत?
इस खबर के बाहर आते ही ज्वैलरी मार्केट और आम ग्राहकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अब देश में सोने की कमी हो जाएगी? विशेषज्ञों का मानना है कि इससे किल्लत तो नहीं होगी, लेकिन सोने की 'सप्लाई चेन' पर असर जरूर पड़ सकता है। जब आयात पर पाबंदियां लगती हैं, तो बाजार में सोने की उपलब्धता थोड़ी कम हो जाती है, जिससे स्थानीय प्रीमियम (Local Premium) बढ़ सकता है। यानी, आपको आधिकारिक सोने की कीमत के ऊपर कुछ अतिरिक्त पैसे देने पड़ सकते हैं। हालांकि, सरकार का मानना है कि उनके पास पर्याप्त स्टॉक है और यह नियम केवल अनियंत्रित आयात को रोकने के लिए है।
आम ग्राहकों और ज्वैलर्स पर क्या होगा असर?
ज्वैलर्स के लिए अब कच्चे सोने (Raw Gold) की खरीद थोड़ी महंगी और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। छोटे ज्वैलर्स को बड़े सप्लायर्स पर निर्भर रहना होगा, जो शायद बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालें। आम ग्राहकों के लिए इसका मतलब है कि आने वाले समय में सोने के गहनों की मेकिंग चार्ज या कीमतों में थोड़ी और बढ़ोतरी देखी जा सकती है। शादी-ब्याह के सीजन में जब मांग चरम पर होती है, तब इन नियमों का असर ज्यादा साफ दिखाई देगा।
