दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों पर एक बार फिर दबाव बढ़ता नजर आ रहा है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका के बीच अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने दिसंबर 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान बढ़ा दिया है। पहले बैंक ने दिसंबर में कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया था, जिसे अब बढ़ाकर 90 डॉलर कर दिया गया है। यानी अनुमान में करीब 6 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। हालांकि, यह अनुमान उस समय के करीब 103 डॉलर प्रति बैरल के बाजार भाव से कम है।
कच्चा तेल होगा महंगा?
2027 में 125 डॉलर तक जा सकता है तेल
गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी है कि अगर पश्चिम एशिया में तेल उत्पादन लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तेल के ठिकानों को नुकसान पहुंचता है और जहाजों की आवाजाही में बाधाएं बढ़ती हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। ऐसी खराब स्थिति में 2027 के दौरान ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। यह बैंक का सबसे खराब स्थिति वाला अनुमान है, न कि कीमत बढ़ने की पक्की भविष्यवाणी। बैंक का सामान्य अनुमान अब भी यही है कि 2027 में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 80 डॉलर प्रति बैरल रह सकता है।
कीमतें कम होने की संभावना भी
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की आशंका के बावजूद गिरावट की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया है। गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक, अगर खाड़ी देशों में तेल का उत्पादन उम्मीद से तेजी से सुधरता है और सप्लाई से जुड़ी चिंताएं कम होती हैं, तो 2027 में ब्रेंट क्रूड की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक भी आ सकती है। यानी तेल का भविष्य काफी हद तक पश्चिम एशिया के हालात और वैश्विक सप्लाई पर निर्भर करेगा।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश के आयात बिल और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। रुपये की स्थिति, सरकारी करों और तेल कंपनियों की लागत के आधार पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने का मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत बढ़ ही जाएंगी। घरेलू ईंधन के दाम कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करते हैं।
फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों पर सभी की नजर पश्चिम एशिया के हालात पर है। अगर सप्लाई में रुकावटें बढ़ती हैं, तो तेल महंगा रह सकता है। वहीं, उत्पादन और आपूर्ति में सुधार होने पर कीमतों में राहत भी मिल सकती है।
