Gasoline Price Crisis : दुनिया भर में पेट्रोल और गैसोलीन की बढ़ती कीमतों (Gasoline price rise) को लेकर चिंता बढ़ गई है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव तथा मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने ईंधन बाजार पर दबाव और बढ़ा दिया है। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से ही पेट्रोल महंगा नहीं होता। इसके पीछे कई अन्य कारण भी काम करते हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण रिफाइनिंग क्षमता की कमी और ईंधन बनाने की लागत में बढ़ोतरी है।
गैसोलीन की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता (तस्वीर-Canva)
कच्चा तेल नहीं, रिफाइनिंग मार्जिन बढ़ा रहा है परेशानी
पेट्रोल की कीमतों को समझने के लिए क्रैक स्प्रेड को समझना जरूरी है। यह कच्चे तेल की कीमत और उससे तैयार होने वाले पेट्रोल, डीजल जैसे उत्पादों की कीमत के बीच का अंतर होता है। जब यह अंतर बढ़ता है तो तेल कंपनियों के लिए कच्चे तेल को ईंधन में बदलना महंगा हो जाता है और इसका असर ग्राहकों तक पहुंचता है। मौजूदा समय में क्रैक स्प्रेड 2022 के स्तर से भी ऊपर पहुंच गया है। उस समय रूस-यूक्रेन युद्ध और कोरोना महामारी के बाद बढ़ी मांग के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था। अब भी रिफाइनिंग क्षमता पर दबाव के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध से शुरू हुई थी ईंधन संकट की समस्या
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा ईंधन संकट केवल अमेरिका-ईरान तनाव की वजह से नहीं है। इसकी शुरुआत रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ही हो गई थी। इस युद्ध ने दुनिया की तेल सप्लाई और रिफाइनिंग व्यवस्था को काफी प्रभावित किया। रूस दुनिया के बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। युद्ध के बाद रूस से कच्चे तेल और रिफाइंड ईंधन की सप्लाई प्रभावित हुई। रूस में कच्चे तेल का उत्पादन और रिफाइनिंग गतिविधियां काफी कम हुईं, जिससे वैश्विक बाजार में तैयार ईंधन की उपलब्धता पर असर पड़ा। इसके अलावा रूस ने डीजल निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाया, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की सप्लाई कम हो गई। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब दुनिया के बड़े ईंधन आपूर्तिकर्ताओं में से एक देश अचानक निर्यात घटा देता है, तो इसका असर पूरी सप्लाई चेन पर पड़ता है।
ईरान-यूएस संघर्ष ने बढ़ाई मुश्किलें
अब अमेरिका-ईरान तनाव और मध्य पूर्व में बढ़ती अशांति ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, मध्य पूर्व के कुछ प्रमुख निर्यात रिफाइनरी केंद्र अभी पूरी तरह दोबारा शुरू नहीं हो पाए हैं। इस कारण एक अजीब स्थिति पैदा हो गई है। बाजार में कच्चा तेल उपलब्ध है, लेकिन उसे पेट्रोल, डीजल और अन्य उपयोगी ईंधनों में बदलने की क्षमता सीमित है। यानी समस्या तेल की कमी नहीं बल्कि तैयार ईंधन की कमी की है।
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें फिर 4 डॉलर के पार
अमेरिका में औसत गैसोलीन कीमत एक बार फिर 4 डॉलर प्रति गैलन के ऊपर पहुंच गई है। यह स्तर मई के बाद सबसे ज्यादा है। गैसोलीन वायदा कीमतों में भी तेजी देखने को मिली है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल की कीमतों पर सबसे ज्यादा असर रिफाइनिंग क्षमता और तैयार ईंधन की उपलब्धता का पड़ रहा है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर दुनिया की नजर
तेल बाजार के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण है। यह रास्ता केवल कच्चे तेल की सप्लाई के लिए ही नहीं, बल्कि तैयार पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही के लिए भी जरूरी है। अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या सप्लाई बाधित होती है, तो दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
आगे भी महंगा रह सकता है ईंधन
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता में सुधार नहीं होता और मध्य पूर्व में तनाव जारी रहता है, तो कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ने के बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमतें ऊंची रह सकती हैं। यानी मौजूदा ईंधन संकट केवल युद्ध का नतीजा नहीं है, बल्कि वर्षों से बन रही वैश्विक सप्लाई और उत्पादन संबंधी समस्याओं का परिणाम है। आने वाले समय में ऊर्जा बाजार में स्थिरता के लिए रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाना और सप्लाई चेन को मजबूत करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
