प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्य सचिवों के साथ हाल ही में हुए बैठक में राज्यों से मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट करने की अपील की और राज्यों से ग्लोबल कंपनियों को आकर्षित करने के लिए इज ऑफ डूइंग बिजनेस में सुधार और बेहतर माहौल देने को कहा है। साथ ही राज्यों से मिलकर घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के लिए 100 उत्पादों की पहचान करने का आह्वान किया है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो और विकसित भारत के विजन को जल्द से जल्द पूरा किया जा सके। पीएम मोदी ने ये सब बदलते वैश्विक हालात को देखते हुए कहा है। उनके इस अपील के दूरगामी मायने हैं। आइए आपको समझाते हैं कि भारत के मैन्युफैक्चरिंग हब बनने से 5 ट्रिलियन इकोनॉमी बनने से लेकर युवा आबादी को नौकरियां और प्रति व्यक्ति आय में कैसे बढ़ोतरी होगी?
पीएम मोदी की ये है तैयारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत अब "रिफॉर्म एक्सप्रेस" पर सवार है, जो अपनी युवा आबादी की ताकत से तेजी से चल रही है। लगभग 70 प्रतिशत आबादी कामकाजी उम्र में है, जो भारत को तेज आर्थिक प्रगति और विकसित भारत की ओर ले जाने का अवसर देता है। प्रधानमंत्री ने 'मेड इन इंडिया' को गुणवत्ता और ग्लोबल चैलेंज से मुकाबला करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने जल्द National Manufacturing Mission (NMM) लॉन्च करने की जानकारी दी और राज्यों से विनिर्माण, इज ऑफ डूइंग बिजनेस और सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की अपील की। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता को मजबूत करने और 'जीरो इफेक्ट, जीरो डिफेक्ट' के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। यानी पीएम मोदी मैन्युफैक्चरिंग के दम पर भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के विजन के साथ आगे बढ़ रहे हैं।मैन्युफैक्चरिंग में वर्ल्ड चीन और भारत कहां?
भारत दुनिया में अभी 5वां सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरर है, जो तेजी से बढ़ रहा है और सरकारी सपोर्ट (PLI स्कीम) से इन्वेस्टमेंट आकर्षित कर रहा है, लेकिन चीन दुनिया की सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस बना हुआ है, जिसका आउटपुट बहुत ज्यादा है, दुनिया के प्रोडक्शन में चीन का हिस्सा करीब 28-35% तक है। वहीं, भारत का वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में हिस्सेदारी अभी करीब 2.8–3% है। हालांकि भारत को सप्लाई चेन में डाइवर्सिफिकेशन के लिए एक मजबूत विकल्प/पूरक के तौर पर उभरा है। दुनियाभर की कंपनियां अब चीन के बजाय भारत की ओर रुख कर रही है। इससे भारत में मैन्युफैक्चरिंग तेजी से बढ़ रहा है।
स्मार्टफोन निर्यात में चीन को पीछे छोड़ा
भारत ने अमेरिका को स्मार्टफोन निर्यात के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में अमेरिका में आयात होने वाले स्मार्टफोन्स में 44% हिस्सेदारी भारत में बने फोन्स की रही, जो पिछले साल इसी अवधि में सिर्फ 13% थी। वहीं चीन की हिस्सेदारी घटकर 61% से 25% रह गई, जबकि वियतनाम की हिस्सेदारी 30% रही। इस तेज़ बढ़त की सबसे बड़ी वजह Apple का भारत की ओर उत्पादन शिफ्ट करना है।
अब भारत लगा रहा तेज छलांग
चीन भले ही मैन्युफैक्चरिंग में नंबर वन बना हुआ है लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पिछले कई वर्षों में सुधर रहा है, विशेषकर PLI (Production Linked Incentive) जैसे स्कीम से। भारत में मोबाइल फोन का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। इसके अलावा ऑटो सेक्टर में भी भारत की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। दुनिया की कई बड़ी कंपनियां अपनी गाड़ियों का यहां से निर्यात कर विदेशों में भेज रही है।
चीन से इन मामले में भारत को बढ़त
1. लोअर लेबर कॉस्ट: भारत में औसत मजदूरी चीन की तुलना में काफी कम है। भारत में लगभग 2/ डॉलर प्रति घंटा मजदूरी है। वहीं चीन में यह 5 डॉलर प्रति घंटा है। इसलिए दुनियाभर की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां तेजी से भारत की ओर आकर्षित हो रही है।
2. युवा वर्कफोर्स और विशाल घरेलू बाजार: भारत की युवा आबादी और तेजी से बढ़ती घरेलू मांग इसे मैन्युफैक्चरिंग निवेश के लिए एक आकर्षक बाजार बनाती है।
3. सप्लाई चेन विविधीकरण: कोरोना महामारी के बाद वैश्विक कंपनियां अब अपनी विनिर्माण आपूर्ति को चीन पर निर्भर रहने के बजाय भारत और अन्य देशों में विभाजित कर रही हैं, जिससे भारत को लाभ मिल रहा है।
भारत बनाम चीन
भारत चीन को क्यों छोड़ सकता पीछे?
भारत और चीन की आर्थिक वृद्धि के मॉडल एक-दूसरे से काफी अलग हैं। भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खपत पर आधारित है, जबकि चीन की वृद्धि निवेश और निर्यात के सहारे टिकी हुई है। चीन में सरकार के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर उद्योग, इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्यात को बढ़ावा दिया गया, जिससे वह “दुनिया की फैक्ट्री” बना। हालांकि, लंबे समय तक कम वेतन और ज्यादा बचत की वजह से घरेलू खपत सीमित रही। इसके उलट, भारत की विकास कहानी सेवाओं, डिजिटल अर्थव्यवस्था, व्यापार और खुदरा क्षेत्र से आगे बढ़ी है। UPI, इंडिया स्टैक, डिजिटल पेमेंट और ई-कॉमर्स ने खपत को आसान बनाया है। भारत की GDP में खपत की हिस्सेदारी 58% से अधिक है, जबकि चीन में यह करीब 40% के आसपास बनी हुई है।
जनसांख्यिकी भी बड़ा कारण है। भारत की आबादी युवा है, जिससे भविष्य में खपत की अपार संभावनाएं हैं। वहीं चीन तेजी से बुजुर्ग होती आबादी, ऊंचे कर्ज और हाउसिंग मार्केट की सुस्ती से जूझ रहा है। हालांकि भारत के लिए जोखिम भी हैं—अगर घरेलू मांग धीमी हुई, मैन्युफैक्चरिंग नहीं बढ़ी या आयात ज्यादा हुआ तो आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। वहीं चीन की चुनौती निवेश-आधारित मॉडल से खपत-आधारित मॉडल की ओर संतुलित बदलाव करना है। आने वाले वर्षों में यह देखना अहम होगा कि कौन-सा मॉडल वैश्विक अस्थिरता के दौर में ज्यादा टिकाऊ साबित होता है।
