N Chandrasekaran Story: टाटा समूह के इतिहास में साल 2017 एक ऐसा मोड़ था जिसने 149 साल पुरानी एक बड़ी परंपरा को तोड़ दिया। टाटा संस के प्रमुख (होल्डिंग) पद पर हमेशा टाटा परिवार या पारसी समुदाय के दिग्गजों का कब्जा रहा था। लेकिन उस साल एक गैर-पारसी और पूरी तरह से प्रोफेशनल व्यक्ति नटराजन चंद्रशेखरन को टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया। जिन्हें लोग प्यार से 'चंद्रा' भी कहते हैं। अब करीब एक दशक तक भारत के इस सबसे बड़े कॉरपोरेट ग्रुप को संभालने के बाद, चंद्रशेखरन ने फैसला किया है कि वह 20 फरवरी 2027 को अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद पद छोड़ देंगे। आइए जानते हैं कि एक तमिल किसान परिवार का बेटा कैसे टाटा संस का मुखिया बना और अब उनके हटने की वजह क्या है।
गैर-पारसी होते हुए भी चंद्रशेखरन को क्यों चुना गया?
1868 में जमशेदजी टाटा द्वारा शुरू किए गए टाटा ग्रुप में हमेशा से पारसी समुदाय और टाटा परिवार का दबदबा रहा। लेकिन 2017 में जब तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री को अचानक पद से हटाया गया, तब ग्रुप में भारी विवाद छिड़ गया। मामला कोर्ट तक पहुंचा और टाटा ग्रुप की साख पर सवाल उठने लगे। ऐसे मुश्किल समय में रतन टाटा को किसी ऐसे इंसान की तलाश थी जो पारिवारिक पहचान से परे जाकर सिर्फ अपने काम और काबिलियत से ग्रुप को संभाले और आगे बढ़ा सके। ऐसे में उनकी नजर एन चंद्रशेखरन पर पड़ी। चंद्रशेखरन 1987 में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) से जुड़े थे। अपनी मेहनत के दम पर वे 2009 में TCS के सीईओ बने और कंपनी को नई ऊंचाइयों पर ले गए। उनकी इसी काबिलियत, ईमानदारी और शांत स्वभाव को देखकर रतन टाटा ने 149 साल पुरानी परंपरा तोड़ते हुए उन्हें टाटा संस की कमान सौंप दी।
रतन टाटा का अटूट भरोसा और अनोखी दोस्ती
रतन टाटा और चंद्रशेखरन का रिश्ता सिर्फ मालिक और कर्मचारी जैसा नहीं था, बल्कि दोनों के बीच गहरा विश्वास और भरोसा था। चंद्रशेखरन हर बड़े फैसले में रतन टाटा से सलाह लेते थे और रतन टाटा भी उनकी व्यावसायिक समझ पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे। इस रिश्ते की एक बहुत ही खास और मशहूर कहानी मुंबई स्थित टाटा के मुख्यालय 'बॉम्बे हाउस' से जुड़ी है। 2017 में जब बॉम्बे हाउस की मरम्मत का काम शुरू हुआ, तो रतन टाटा ने चंद्रशेखरन से पूछा कि वहां रहने वाले आवारा कुत्तों का क्या होगा? चंद्रशेखरन ने इस बात को हलके में नहीं लिया। जब इमारत बनकर तैयार हुई, तो उसमें आवारा कुत्तों के रहने, खाने और आराम करने के लिए एक खास वातानुकूलित (एसी) कमरा बनाया गया। रतन टाटा इस संवेदनशीलता को देखकर बेहद खुश हुए थे। चंद्रशेखरन ने रतन टाटा के सबसे बड़े सपने एयर इंडिया की टाटा ग्रुप में वापसी भी कराई। 1932 में जेआरडी टाटा द्वारा शुरू की गई एयर इंडिया को 2022 में सरकार से वापस खरीदकर चंद्रशेखरन ने रतन टाटा को एक भावुक तोहफा दिया था।
149 साल पुरानी परंपरा तोड़ने वाले एन. चंद्रशेखरन का टाटा संस से इस्तीफा (तस्वीर- Tata Group)
10 सालों में टाटा ग्रुप को कैसे बदला?
चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने पुरानी परंपराओं से निकलकर आधुनिक दुनिया में कदम रखा। उन्होंने समूह को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया।
- कारोबार का सरलीकरण: उन्होंने ग्रुप की सैकड़ों उलझी हुई कंपनियों को एक साथ जोड़कर आसान बनाया।
- नए दौर के कारोबार: सेमीकंडक्टर (चिप निर्माण), इलेक्ट्रॉनिक्स, ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) और डिजिटल बिजनेस (जैसे टाटा न्यू और बिगबास्केट) में भारी निवेश किया।
- कंपनी का विस्तार: आज टाटा समूह में 31 प्रमुख कंपनियां हैं जो दुनिया के 100 से अधिक देशों में काम करती हैं।
रतन टाटा के जाने के बाद क्यों बिगड़े हालात?
9 अक्टूबर 2024 को रतन टाटा का निधन हो गया। उनके जाने के बाद टाटा ग्रुप के टॉप नेतृत्व में बड़ा बदलाव आया। टाटा संस में 66% हिस्सेदारी रखने वाले 'टाटा ट्रस्ट' के नए चेयरमैन नोएल टाटा बने। इसके बाद टाटा संस के चेयरमैन चंद्रशेखरन और टाटा ट्रस्ट के प्रमुख नोएल टाटा के बीच कई मुद्दों पर मतभेद शुरू गया।
- शेयर बाजार में लिस्टिंग का मुद्दा: खबरों के अनुसार, नोएल टाटा चाहते थे कि टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट न किया जाए, जबकि इस पर स्पष्टता को लेकर दोनों में सहमति नहीं बन पा रही थी।
- बोर्ड में हिस्सेदारी और अधिकार: कंपनी के बोर्ड में ट्रस्ट के प्रतिनिधित्व और रणनीतिक फैसलों को लेकर भी खींचतान थी।
- शापूरजी पालोनजी ग्रुप का मामला: टाटा संस से शापूरजी पालोनजी ग्रुप को बाहर निकालने के रास्ते और 5 साल की रणनीतिक योजना पर भी नोएल टाटा अधिक स्पष्टता चाहते थे।
कुर्सी छोड़ने का फैसला क्यों लेना पड़ा?
टाटा संस के दो सबसे बड़े ट्रस्टों (सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट) ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल को 2027 के बाद भी 5 साल बढ़ाने की सिफारिश की थी। 24 फरवरी, 2026 को जब यह प्रस्ताव टाटा संस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के सामने रखा गया, तो बोर्ड के एक सदस्य (माना जाता है कि नोएल टाटा की तरफ से) ने इसका समर्थन नहीं किया। सर्वसम्मति न बनने के कारण फैसला टल गया। छह महीने बीत जाने के बाद भी जब यह गतिरोध खत्म नहीं हुआ, तो चंद्रशेखरन ने खुद ही हटने का फैसला कर लिया। उन्होंने कहा कि टाटा संस कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है और ऐसे समय में नेतृत्व को लेकर भ्रम बने रहना कंपनी, कर्मचारियों और निवेशकों के लिए ठीक नहीं है। इसीलिए उन्होंने बोर्ड से कहा है कि वे नया चेयरमैन तलाशना शुरू कर दें ताकि सही समय पर जिम्मेदारी नए हाथों में सौंपी जा सके।
एन. चंद्रशेखरन का जाना टाटा समूह के एक ऐतिहासिक दौर का अंत है। 1987 में एक आम कर्मचारी के रूप में शुरुआत करके ग्रुप के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाले 'चंद्रा' ने यह साबित किया कि काबिलियत के आगे परंपराएं भी बदल जाती हैं। फरवरी 2027 में उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले अब टाटा ट्रस्ट और टाटा संस को मिलकर एक नए चेयरमैन की तलाश करनी होगी। देखना यह होगा कि क्या अगला चेयरमैन फिर से टाटा परिवार या पारसी समुदाय से होगा या फिर चंद्रशेखरन की तरह किसी नए प्रोफेशनल को यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
