वैश्विक अर्थव्यवस्था में जब भी पावरफुल Currencies की बात होती है, तो अमेरिकी डॉलर का नाम सबसे ऊपर आता है। लेकिन दूसरी ओर, कुछ ऐसी मुद्राएं भी हैं जो वक्त की मार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के चलते अपनी साख पूरी तरह खो चुकी हैं। इनमें सबसे ऊपर नाम आता है ईरानी रियाल (IRR) का। आज स्थिति यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1 ईरानी रियाल की कीमत $0.00 के स्तर पर पहुंच गई है। यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि डॉलर के मुकाबले रियाल की वैल्यू इतनी गिर चुकी है कि उसे दशमलव के कई अंकों के बाद ही मापा जा सकता है। ईरान में एक आम आदमी को एक ब्रेड का पैकेट या एक कप कॉफी खरीदने के लिए भी हजारों और कभी-कभी लाखों रियाल खर्च करने पड़ते हैं।
क्यों आई रियाल की कीमत में इतनी बड़ी गिरावट?
ईरानी रियाल के इस ऐतिहासिक पतन के पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही समस्याओं का एक लंबा सिलसिला है। इसका सबसे मुख्य कारण ईरान पर लगे कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध (Sanctions) हैं। परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा लगाए गए इन प्रतिबंधों ने ईरान की तेल अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। ईरान अपनी आय के लिए तेल निर्यात पर निर्भर है, और जब उस पर पाबंदी लगी, तो देश में डॉलर की भारी कमी हो गई। मांग और आपूर्ति के इसी असंतुलन ने रियाल को रद्दी के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। इसके अलावा, देश के भीतर बढ़ती मुद्रास्फीति (Inflation) और राजनीतिक अस्थिरता ने आग में घी डालने का काम किया है।
नोटों की गड्डियां और मुट्ठी भर सामान ईरान की इस गिरती करेंसी का सबसे बुरा असर वहां की आम जनता पर पड़ा है। वहां 'हाइपर-इन्फ्लेशन' (बेकाबू महंगाई) की स्थिति है। आज 1 अमेरिकी डॉलर के बदले लाखों ईरानी रियाल मिलते हैं। इसकी वजह से वहां की कीमतों का गणित पूरी तरह बदल गया है। दुकानदार सामान बेचने के लिए नोटों को गिनने के बजाय अब उन्हें तौलने लगे हैं। लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बैग भरकर नकदी ले जानी पड़ती है। हालांकि, सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए 'टोमन' (Toman) नामक एक नई इकाई भी पेश की (जिसमें 1 टोमन = 10,000 रियाल), लेकिन बुनियादी आर्थिक सुधारों के बिना यह केवल कागजी बदलाव बनकर रह गया है।
क्या आगे सुधरेगी स्थिति?
साल 2026 में भी ईरानी रियाल के लिए चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ईरान और पश्चिमी देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों में सुधार नहीं होता और आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटते, तब तक रियाल की वैल्यू में सुधार की गुंजाइश बहुत कम है। विदेशी निवेश की कमी और बैंकिंग सिस्टम पर पाबंदियों के कारण रियाल लगातार कमजोर होता जा रहा है। यह स्थिति हमें यह सिखाती है कि किसी भी देश की मुद्रा केवल कागज का टुकड़ा नहीं होती, बल्कि वह उस देश की आर्थिक शक्ति और वैश्विक संबंधों का आईना होती है।
