AI Robot Training India : AI की वजह से दुनिया में सबसे पहल IT इंडस्ट्री में तबाही देखने को मिली है। पिछले कुछ ही वर्षों में AI के चलते AI सेक्टर में लाखों नौकरियां खत्म हुई हैं। जब AI का विकास शुरू हुआ था, तो माना जा रहा था कि यह तकनीक व्हाइट कॉलर जॉब्स के लिए खतरा नहीं होगी। लेकिन, जब दुनियाभर में एआई मॉडल्स कमर्शियल होने लगे हैं, तो सबसे पहला झटका व्हाइट कॉलर जॉब्स को ही लगा है।
भविष्य का खतरा पहचाने बिना रोबोट्स को ट्रेनिंग दे रहे भारतीय
फिलहाल, जब दुनियाभर में माना जा रहा है कि मेहनत मजदूरी वाले काम AI की वजह से प्रभावित नहीं होंगे, लेकिन जल्द ही इस धारणा को भी झटका लगने वाला है। क्योंकि, अब पूरी दुनिया में इस बात का खौफ है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोट्स आने वाले समय में इंसानों की नौकरियां निगल जाएंगे। लेकिन हैरत की बात यह है कि इन फ्यूचरिस्टिक रोबोट्स को इंसान की तरह काम करना, चलना-फिरना और घर के रोजमर्रा के काम करना कोई और नहीं, बल्कि भारतीय घरेलू महिलाएं और मजदूर सिखा रहे हैं।
भारत के घरों में खड़ी हो रही AI ट्रेनर्स की फौज
चेन्नई से लेकर बेंगलुरु तक, भारत में हजारों ऐसे 'AI सिस्टम ट्रेनर्स' की एक फौज खड़ी हो गई है। ये लोग रोबोट्स को इंसानों की तरह सोचना और काम करना सिखा रहे हैं। भारत में हजारों ऐसे श्रमिक और घरेलू महिलाएं हैं, जो उनकी नौकरियों और काम के लिए छिपे खतरे को पहचाने बिना ही एआई रोबोट्स को ट्रेनिंग दे रहे हैं।
कितना पैसा मिल रहा?
यह सबसे दिलचस्प पहलू है, जिसकी वजह से तमाम लोग आने वाले खतरे की चिंता किए बिना AI Robots के लिए ट्रेनिंग डाटा जुटाने वाली कंपनियों के लिए काम कर रहे हैं। AFP की एक रिपोर्ट के मुताबिक आम काटने और तौलिया मोड़ने जैसे कामों की ट्रेनिंग देने के लिए लोगों को ₹250 प्रति घंटे तक मिलते हैं। इसके लिए इन लोगों को कुछ खास नहीं करना होता है। बल्कि, काम करते समय सिर्फ अपने सिफ पर कैमरा या स्मार्टफोन लगाना होता है।
आखिर टेक कंपनियों को क्यों चाहिए ये डेटा?
चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे एआई टूल इंटरनेट पर मौजूद टेक्स्ट और तस्वीरों को पढ़कर स्मार्ट बने हैं। लेकिन अगर किसी ह्यूमनॉइड रोबोट को असल जिंदगी में आपके घर का काम करना है। जैसे सैंडविच बनाना, कॉफी मशीन चलाना या तौलिया मोड़ना, तो उसे यह सीखना होगा कि इंसानी हाथ असल में कैसे मूव करते हैं। इसके लिए उन्हें एगोसेंट्रिक डाटा की जरूरत पड़ती है।
क्या होता है Egocentric Data?
जब कोई इंसान सिर पर कैमरा पहनकर काम करता है, तो कैमरे में सिर्फ उसके हाथ और काम करने का तरीका दिखता है। इसे विज्ञान की भाषा में 'एगोसेंट्रिक डेटा' या फर्स्ट-पर्सन फुटेज कहा जाता है। इसे एआई मॉडल्स में फीड किया जाता है ताकि रोबोट हूबहू इंसानों की नकल करना सीख सकें। इस डेटा को कलेक्ट करने के लिए 'ऑब्जेक्टवेज' (Objectways) जैसी कंपनियां काम कर रही हैं, जिनके क्लाइंट्स में अमेजन से लेकर फॉर्च्यून 500 की बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां शामिल हैं।
2050 तक 1 अरब से ज्यादा होंगे AI रोबोट्स
इन्वेस्टमेंट बैंक मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2050 तक दुनिया भर में 1 अरब से ज्यादा ह्यूमनॉइड रोबोट्स का इस्तेमाल होने लगेगा, जो ज्यादातर फैक्ट्रियों और घरों में काम करेंगे। भारत इस वक्त दुनिया के लिए 'एआई डेटा प्रोसेसिंग' का सबसे बड़ा मिडलमैन (केंद्र) बनकर उभरा है।
सिक्के का डरावना पहलू
भारत सरकार के थिंक-टैंक नीति आयोग ने इस साल भारत में होने वाले ग्लोबल एआई समिट से पहले जारी एक रिपोर्ट में इस खतरे की ओर इशारा किया है। नीति आयोग का कहना है: "आमतौर पर माना जाता है कि एआई से सिर्फ व्हाइट-कॉलर (ऑफिस में काम करने वाले) लोगों की नौकरियां जाएंगी। लेकिन इस बात पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है कि इसका भारत के 490 मिलियन (49 करोड़) अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों (Informal Workers) पर क्या असर पड़ेगा, जो हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।"
