भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन एक सवाल अब भी बना हुआ है कि इतनी तेज GDP ग्रोथ के बावजूद देश मैन्युफैक्चरिंग सुपरपावर क्यों नहीं बन पाया? इसी सवाल ने एक बार फिर आर्थिक बहस को तेज कर दिया है। Cambridge University के Associate Professor और पॉलिटिकल इकोनॉमिस्ट Jostein Hauge ने मशहूर अर्थशास्त्री Ha-Joon Chang के तर्कों के आधार पर भारत में औद्योगीकरण की कमजोरियों पर सवाल उठाए हैं।
कैम्ब्रिज प्रोफेसर ने बताया क्यों अटका भारत
जोस्टीन हेग हा जून चांग के इस तर्क से सहमति जताते हैं कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग की समस्या सिर्फ सरकार की नीतियों से नहीं जुड़ी है। उनके मुताबिक भारतीय उद्योग घराने और पूंजीपति हमेशा शॉर्ट टर्म रिटर्न पर ज्यादा फोकस्ड रहे हैं। जबकि, मजबूत आद्यौगिक बुनियाद खड़ा करने के लिए दशकों का इंतजार करना पड़ता है। इसके लिए कैपिटल, स्किल और इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ ही रिसर्च पर पैसा लगाना पड़ता है।
क्या है भारत की असल समस्या?
प्रोफेसर हेग और चांग के हिसाब से भारत की समस्या को समझने के लिए यह देखना होगा कि पॉलिसी के साथ-साथ कैपिटल किस तरह के इंसेंटिव के तहत काम कर रहा है। क्योंकि, जब अच्छी नीतियों को मजबूत वित्तीय सपोर्ट नहीं मिलता है, तो उन नीतियों का जमीन पर कोई खास असर नहीं रह जाता है।
भारत के औद्योगीकरण पर क्या कहते हैं चांग?
Ha-Joon Chang भारत के औद्योगीकरण को दक्षिण कोरिया के अनुभवों के आधार पर तौलते हुए कहते हैं, भारत ने अपने छोटे उद्योगों को तो सुरक्षा दी है। लेकिन, उन्हें ग्लोबल कंपटीशन के लिए तैयार करने की प्रक्रिया पूरी नहीं की है। उनके मुताबिक दक्षिण कोरिया ने ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और शिपबिल्डिंग जैसी इंडस्ट्रीज को शुरुआती दौर में सुरक्षा, वित्त और सहायता दी, जिसका नतीजा यह हुआ कि ये कंपनियां आज ग्लोबल लेवल पर स्केल पर पाई हैं।
भारत में उठाए गए उल्टे कदम
चांग के मुताबिक भारत में उद्योगों को सुरक्षा घेरा दिया गया, उसने उल्टा काम किया है। सुरक्षा की वजह से ये उद्योग अब ग्लोबल कंपटीशन के काबिल नहीं बचे हैं। चांग का कहना है कि भारत ने विदेशी कंपटीशन से उद्योंगो को बचाने को ही सुरक्षा मान लिया है। जबकि, एक अच्छी नीति यह होती कि उद्योंगों को सुरक्षा और सहायता देकर ग्लोबल कंपटीशन के लिहाज से तैयार किया जाता।
GDP में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी बता रही कहानी
चांग और हेग दोनों ही मैन्युफैक्चरिंग में GDP की हिस्सेदारी को भी सवालिया लहजे में देखते हैं। चांद के मुताबिक भारत की GDP में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा 1960 में करीब 14% था, जो 2000 में लगभग 18% तक पहुंचा, लेकिन बाद में घटकर करीब 12-13% के आसपास आ गया। यानी सवाल केवल यह नहीं है कि भारत में कितनी फैक्ट्री हैं। असली सवाल यह है कि मैन्युफैक्चरिंग देश की इकोनॉमी में कितनी बड़ी भूमिका में है और क्या यह सेक्टर लगातार टेक्नोलॉजी, प्रोडक्टिविटी और एक्सपोर्ट की क्षमता बढ़ा रहा है।
असली समस्या Capital है या Policy?
चांद की सबसे विवादित दलील यहां आती है। उनका कहना है कि भारत के उद्योगपति और बिजनेस घरानों के लिए शॉर्ट टर्म रेट ऑफ रिटर्न ज्यादा अहम है। जबकि, देश के आद्योगीकरण में कई साल तक पैसा ऐसे प्रोजेक्ट्स में लगाना पड़ता है, जिनका रिटर्न तुरंत नहीं मिलता। उनके मुताबिक किसी देश को आद्योगिक बुनियाद बनाने के शुरुआती चरण में कैपिटल को लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट की तरफ मोड़ना पड़ता है। इसे उन्होंने फाइनेंशियल रिप्रेशन के संदर्भ में समझाते हुए कहा कि इकोनॉमी में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें कैपिटल केवल शॉर्ट टर्म फाइनेंशियल रिटर्न के पीछे न जाए, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी, टेक्नोलॉजी और स्किल्स में भी जाए।
क्यों प्राइवेट सेक्टर पर उठे सवाल?
चांग का कहना है कि एक तरफ सरकार को ऐसा पॉलिसी वातावरण बनाना होगा, जिससे प्राइवेट कैपिटल को उन उद्योगों में निवेश करने के लिए इंसेंटिव मिले, जिन्हें देश लंबे समय में विकसित करना चाहता है। इसके साथ ही प्राइवेट सेक्टर को चांग की सलाह है कि उन्हें केवल फैक्ट्री और वर्कर वाली सोच से निकलकर टेक्नोलॉजी और रिसर्च पर भी पैसा खर्च करना होगा। क्योंकि, यही वह क्षेत्र है जहां भारत की कमजोरी साफ दिखाई देती है।
रिसर्च पर GDP की तुलना में बहुत कम खर्च
चांग के मुताबिक भारत का R&D खर्च GDP का करीब 0.6% तक पहुंचा है। 2026 के आंकड़ों के मुताबिक 2023-24 में भारत का ग्रॉस एक्सपेंडिचर ऑन आरएंडडी यानी GERD GDP का 0.84% था। इससे पता चलता है कि खर्च बढ़ा है, लेकिन यह अब भी आधुनिक आद्यौगिक इकोनॉमी की तुलना में काफी कम है। Economic Survey 2025-26 के मुताबिक भारत का R&D खर्च अब भी कई बड़े देशों से काफी पीछे है। खासतौर पर रिसर्च में प्राइवेट फंडिंग को एक अहम चुनौती बताया है।
क्या सिर्फ कारोबारी और पूंजीपति ही जिम्मेदार?
यहीं से इस बहस का दूसरा पक्ष सामने आता है। भारत ने 1947 के बाद लंबे समय तक सेंट्रल प्लानिंग और इम्पोर्ट सब्सिट्यूशन इंडस्ट्रीलाइजेशन का रास्ता अपनाया। इसके तहत इंडस्ट्रियल लाइसेंसिंग, इम्पोर्ट कंट्रोल, हाई टैरिफ और कई क्षेत्रों में सरकारी रिजर्वेशन ने प्राइवेट इंडस्ट्री के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी करके रखीं। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद इनका बड़ा हिस्सा हटाया गया और विदेशी निवेश, प्रतिस्पर्धा और ग्लोबल ट्रेड के लिए इकोनॉमी ज्यादा खुली।
चीन और दक्षिण कोरिया से भारत को क्या सीखना चाहिए?
चांग के मुताबिक चीन का अनुभव इस बहस को और जटिल बनाता है। वहां औद्योगीकरण केवल प्राइवेट कैपिटी की इच्छा पर निर्भर नहीं रहा है।वहां, सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर, पूंजी, अनुदान, निर्यात सपोर्ट और औद्योगिक क्लस्टर बनाकर कंपनियों को बड़ी बनाया और ग्लोबल कंपटीशन के लिए तैयार किया। दूसरी तरफ South Korea में भी सरकार ने सपोर्ट किया, लेकिन बाद में प्राइवेट कैपिटल ने देश के उद्योग की दिशा बदल दी। भारत को इन दोनों ही मॉडल से सीखते हुए अपने लिए कारगर तरीका अनाना चाहिए। जहां, सरकार अच्छा नीतिगत माहौल दे और उद्योगपति व पूंजीपति उद्योगों के विकास के लिए लंबे समय के लिए निवेश करें।
