अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है। लगातार चौथे दिन कीमतों में बढ़ोत्तरी के बाद ब्रेंट क्रूड (Brent Crude Oil) का भाव 106 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। यह उछाल ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले ही महंगाई से जूझ रही है। तेल की कीमतों में आई इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में पैदा हुई बाधाएं हैं। निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर चिंता बढ़ गई है कि अगर यह संकट लंबा खिंचा, तो आने वाले दिनों में ऊर्जा संकट गहरा सकता है।
ईरान वार्ता विफल होने का असर
कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई इस तेजी की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत का बेनतीजा रहना है। पिछले कुछ समय से उम्मीद की जा रही थी कि वार्ता सफल होने पर ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में ढील मिल सकती है, जिससे बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ती और कीमतें कम होतीं। लेकिन बातचीत के अचानक रुक जाने (Talks Stall) से सप्लाई बढ़ने की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। बाजार को अब डर है कि ईरान की तरफ से तेल की आपूर्ति में और भी कड़ाई हो सकती है, जिसका सीधा असर ग्लोबल ऑयल इन्वेंट्री पर पड़ रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव
तेल की कीमतों में आग लगाने का दूसरा बड़ा कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' में बढ़ता सैन्य और रणनीतिक तनाव है। आपको बता दें कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। वर्तमान में यह रास्ता 'चोक' (Choked) यानी बाधित नजर आ रहा है। इस मार्ग पर बढ़ती हलचल और सुरक्षा चिंताओं के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। जब भी होर्मुज जैसे संवेदनशील रास्ते पर कोई संकट आता है, तो वैश्विक तेल बाजार में तुरंत डर का माहौल बन जाता है और कीमतें तेजी से ऊपर भागने लगती हैं।
लगातार चौथे दिन बढ़ी कीमतें
न्यूज़ रिपोर्ट्स के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में यह लगातार चौथे दिन की बढ़त है। $106 प्रति बैरल का स्तर पार करना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों और मांग के मुकाबले कम उत्पादन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज संकट जल्दी नहीं सुलझा और ईरान के साथ कूटनीतिक रास्ते बंद रहे, तो कच्चा तेल बहुत जल्द $110 से $115 के स्तर को भी छू सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाली कोई भी हलचल सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। हालांकि हाल ही में भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिलहाल बढ़ोतरी का कोई प्रस्ताव नहीं है, लेकिन कच्चे तेल का $106 के पार रहना सरकारी तेल कंपनियों और देश के व्यापार घाटे (Trade Deficit) पर दबाव बढ़ाएगा। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो भविष्य में महंगाई को काबू में रखना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
