Lavender Farming News : जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले का भदेरवाह क्षेत्र आज 'भारत की लैवेंडर राजधानी' (India lavender capital) के नाम से जाना जाने लगा है। यहां के हरे-भरे खेत अब बैंगनी रंग के फूलों से ढक जाते हैं, जो पूरे इलाके को बेहद खूबसूरत बना देते हैं। भदेरवाह के लेलरोट और टिपरी जैसे इलाकों में बड़े पैमाने पर लैवेंडर की खेती हो रही है। कटाई के समय यहां का दृश्य और भी आकर्षक हो जाता है, जब किसान फूलों की फसल काटते हैं और वातावरण सुगंध से भर जाता है।
लैवेंडर की खेती जम्मू-कश्मीर के किसानों के लिए फायदेमंद (तस्वीर-istock)
लैवेंडर क्या है?
लैवेंडर एक सुगंधित पौधा है, जिसके बैंगनी रंग के फूलों से बहुत तेज और मनमोहक खुशबू निकलती है। इसका इस्तेमाल इत्र, साबुन, तेल, क्रीम और कई तरह के सौंदर्य और औषधीय उत्पाद बनाने में किया जाता है। यह फसल कम पानी में भी आसानी से उग जाती है, इसलिए इसे सूखे और पहाड़ी इलाकों के लिए भी उपयुक्त माना जाता है।
पारंपरिक खेती से लैवेंडर तक का सफर
पहले इस क्षेत्र के किसान मक्का, धान और दाल जैसी पारंपरिक फसलें उगाते थे। लेकिन इन फसलों से आमदनी कम होती थी और कई बार जंगली जानवर, खासकर बंदर, फसलों को नुकसान पहुंचा देते थे। धीरे-धीरे किसानों ने लैवेंडर की खेती अपनानी शुरू की क्योंकि इसमें नुकसान कम और फायदा ज्यादा है। यह फसल साल में दो बार तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को नियमित आय मिलने लगी।
सरकारी योजनाओं और संस्थानों की भूमिका
भदेरवाह में लैवेंडर खेती की शुरुआत करीब 2010 के आसपास हुई। उस समय वैज्ञानिक संस्थान सीएसआईआर-आईआईआईएम ने कुछ किसानों को लैवेंडर के पौधे उपलब्ध कराए। इसके बाद सरकार की अरोमा मिशन योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, पौध सामग्री दी गई और तेल निकालने के लिए आसवन इकाइयां भी लगाई गईं। इन प्रयासों ने किसानों को नई तकनीक और बाजार से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई।
किसानों की बढ़ती आय और बदलाव
आज भदेरवाह और आसपास के क्षेत्रों में 2,500 से ज्यादा किसान परिवार लैवेंडर की खेती से जुड़े हुए हैं। किसानों का कहना है कि इस फसल ने उनकी आर्थिक स्थिति बदल दी है। 2015 में बहुत छोटी जमीन से इसकी शुरुआत की थी, लेकिन अब वे कई गुना ज्यादा जमीन पर लैवेंडर उगा रहे हैं और बड़ी संख्या में अन्य किसानों को भी रोजगार दे रहे हैं। कुछ किसान किराये की जमीन पर भी लैवेंडर की खेती कर रहे हैं, जिससे बंजर पड़ी जमीन का भी उपयोग हो रहा है।
रोजगार और ग्रामीण विकास में योगदान
लैवेंडर खेती सिर्फ किसानों की आमदनी ही नहीं बढ़ा रही, बल्कि गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रही है। इसके जरिए तेल, इत्र और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिससे मूल्यवर्धन होता है। इससे स्थानीय युवाओं को भी काम मिल रहा है और गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं।
भविष्य की उम्मीदें
भदेरवाह में लैवेंडर की सफलता ने यह दिखा दिया है कि अगर सही तकनीक, सरकारी सहयोग और वैज्ञानिक मार्गदर्शन मिले तो पारंपरिक खेती की जगह नई फसलें किसानों की जिंदगी बदल सकती हैं। आज यह क्षेत्र देश में सुगंधित पौधों की खेती का एक बड़ा उदाहरण बन चुका है और आने वाले समय में इसके और विस्तार की उम्मीद है।
