Women's Rights in Afghanistan: भारत आए तालिबान के विदेश मंत्री को अफगान लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा और काम पर प्रतिबंध लगाने के बारे में सवालों का सामना करना पड़ा। वे रविवार को दिल्ली में एक दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे, जिसमें महिला पत्रकारों को भी बुलाया गया था।
अफगानिस्तान में महिलाओं पर सख्त तालिबानी शासन। Photo-AP
संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित नेता और अफगानिस्तान में तालिबान के वास्तविक शासन में वरिष्ठ मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने दावा किया कि लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा 'हराम' नहीं है, या इस्लाम को नियंत्रित करने वाले कानूनों के तहत इसपर बैन नहीं है, बस देश के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के अगले आदेश तक इसे स्थगित कर दिया गया है।
अब सवाल यहां ये कि भारत में मुत्तकी की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को ना बुलाने पर इतना विवाद हो गया, लेकिन आखिर अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति क्या है?
बुनियादी अधिकारों पर प्रतिबंध
अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां सरकार ने लड़कियों और महिलाओं के बुनियादी अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसमें सार्वजनिक पार्कों, जिम, मस्जिदों, बाजारों और सैलून में भी उनका जाना बैन है।
वहीं, 2021 में अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से, महिलाओं और लड़कियों तथा अभिव्यक्ति की आजादी पर तालिबान के प्रतिबंधों की मानवाधिकार समूहों और विदेशी सरकारों ने आलोचना की है। हालांकि, तालिबान अधिकारी कई बार दावा कर चुके हैं कि वे इस्लामी कानून की अपनी सख्त व्याख्या के अनुसार महिलाओं के अधिकारों का तय करते हैं और सम्मान करते हैं। लेकिन उन्होंने सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की पहुंच पर भी नियंत्रण कड़ा कर दिया है। तालिबान ने देश में विश्वविद्यालय और हाई स्कूल में महिलाओं के जाने पर भी रोक लगा रखा है।
मुत्तकी ने क्या कहा?
मुत्तकी ने भारतीय राजधानी के मध्य में स्थित अफगानिस्तान दूतावास में एकत्रित 50 से अधिक पत्रकारों के एक समूह को बताया, 'वर्तमान में हमारे स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में एक करोड़ छात्र पढ़ रहे हैं, जिनमें से 28 लाख महिलाएं और लड़कियां हैं। धार्मिक मदरसों में यह शिक्षा का अवसर स्नातक स्तर तक उपलब्ध है। कुछ क्षेत्रों में कुछ सीमाएं हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम शिक्षा का विरोध करते हैं।'
बिना पुरुष के नहीं जा सकती महिला
अफगानिस्तान के तालिबान शासकों ने देश में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर करने और उनकी आवाजाही की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से फरमानों का पालन किया है। देश को लेकर संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNAMA) की 2025 में ही प्रकाशित हुई मानवाधिकार रिपोर्ट में कहा गया है, 'अफगान महिलाओं को कार्यबल में शामिल होने के अवसर से वंचित किया जा रहा है, वे पुरुष रिश्तेदारों के बिना सेवाओं तक पहुंचने में असमर्थ हैं, जबकि लड़कियां अभी भी शिक्षा के अपने अधिकार से वंचित हैं।'
जबरन धर्मांतरण
तालिबान अधिकारियों ने मीडिया संस्थानों पर दमनकारी प्रतिबंधों को भी बढ़ा दिया है, शारीरिक दंड को बढ़ा दिया है और धार्मिक स्वतंत्रता पर भी शिकंजा कसा है।
रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि 17 जनवरी से 3 फरवरी के बीच, उत्तर-पूर्वी अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत में, कम से कम 50 इस्माइली पुरुषों को रात में उनके घरों से उठा लिया गया और हिंसा की धमकी देकर उन्हें सुन्नी इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया।
इस अवधि के दौरान, तालिबान अधिकारियों की मौजूदगी वाले सार्वजनिक स्थानों पर, महिलाओं और लड़कियों सहित 180 से ज्यादा लोगों को व्यभिचार और समलैंगिकता के अपराधों के लिए कोड़े मारे गए।
ब्यूटी सैलून बंद
UNAMA के अनुसार, अधिकारियों ने विभिन्न प्रांतों में महिलाओं द्वारा अपने घरों में चलाए जा रहे ब्यूटी सैलून और महिला रेडियो स्टेशनों को बंद कर दिया है।
कंधार प्रांत में नोट किया गया जब एक बाजार में दुकानदारों से कहा गया कि वे बिना मर्द के आने वाली महिलाओं की सूचना दें और उन्हें अपनी दुकानों में प्रवेश न करने दें। एक अस्पताल में अधिकारियों ने कर्मचारियों को आदेश दिया कि वे बिना किसी अभिभावक के महिला रोगियों की देखभाल न करें।
हाल ही में तालिबान में देश में इंटरनेट बंद कर दिया। जिससे पढ़ने लिखने वाले बच्चों को बहुत दिक्कत हो रही है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों का कहना है कि राजधानी काबुल स्थित कार्यालयों से उनका संपर्क टूट गया है। पूरे अफगानिस्तान में मोबाइल इंटरनेट और सैटेलाइट टीवी भी बुरी तरह बाधित हो गए।
