सोशल मीडिया पर प्रकृति का एक बेहद ही दुर्लभ वीडियो इस वक्त देखने को मिल रहा है। जहां एक काले लंगूर की गोद में नारंगी रंग के दो छोटे-छोटे मासूम बच्चे जैसे लंगूर खेलते दिखाई दे रहे हैं। लंगूरों के इस वीडियो को सोशल साइट एक्स पर रिटायर्ड भारतीय वन सेवा अधिकारी सुशांत नंदा ने शेयर किया है। वीडियो के कैप्शन में उन्होंने लंगूर के इस खास नस्ल के बारे में कुछ जानकारी भी दी है।
अपने बच्चों के साथ दुनिया का सबसे दुर्लभ प्रजाति का लंगूर (X/@susantananda3)
लंगूरों की सबसे दुर्लभ प्रजाति
उन्होंने कैप्शन में लिखा कि, ये खास किस्म के लंगूरों की प्रजाति का नाम कैट बा लंगूर है। जो अब दुनिया के सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त प्राइमेट्स में से एक है। जंगल में इनकी संख्या अब सिर्फ 70 के आसपास ही बची है। ये लंगूर विलुप्त होने की कागार पर हैं। ये लंगूर खास तौर पर वियतनाम के हा लॉन्ग बे (Ha Long Bay) के पास कैट बा द्वीप पर पाए जाते हैं। यह द्वीप चट्टानों, गुफाओं और समुद्र से घिरा हुआ है। यहां की चट्टानों पर ये बंदर चढ़ते-उतरते अक्सर दिख जाया करते हैं।
ये भी पढ़ें: यहां खिड़की से चलती है दुकान, बिल्डिंग के पहली मंजिल से बाल्टी में रखकर लटकाया जाता है सामान
बच्चे होते हैं नारंगी, लेकिन बड़े होने पर हो जाते हैं काले
इन लंगूरों की सबसे खास बात यह है कि इनके बच्चे पैदा होते समय चमकीले नारंगी रंग के होते हैं लेकिन जैसे-जैसे ये बड़े होते हैं, उनका रंग काला होते जाता है, और सिर पर हल्का सुनहरा या सफेद बाल रह जाता है। नारंगी रंग के इनके बच्चे देखने में बहुत प्यारे लगते हैं। इन लंगूरों के साथ एक और खास बात है जो इन्हें पूरी दुनिया से अलग बनाती है। वह ये है कि ये लंगूर समुद्र का खारा पानी पी सकते हैं। जहां दुनिया के ज्यादातर जानवर खारा पानी पीने से बीमार पड़ जाते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है। वहीं, कैट बा लंगूर समुद्र के खारे पानी को पीकर ही जिंदा रहते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये जिस द्वीप पर रहते हैं, वहां पीने के लिए सिर्फ समुद्र का खारा पानी ही मिलता है। मीठा पानी कैट बा द्वीप पर बहुत ही कम पाया जाता है।
समुद्र का खारा पानी पीते हैं ये लंगूर
ये लंगूर अपनी पूंछ को पानी में डुबोकर उसे चूसते हैं या सीधे मुंह से थोड़ा-थोड़ा करके पानी को पीते हैं। ये पत्तियां, फल और फूल खाते हैं। ये अधिकतर आपको चट्टानों पर मिलेंगे। स्वभाव से ये बेहद ही शर्मीले होते हैं, इसलिए इन्हें देखना बहुत मुश्किल है। पहले इनका बहुत ही ज्यादा शिकार किया जाता था। लोग गलतफहमी में इन्हें दवा बनाने के लिए मारते थे। अब सरकार और कई संगठन इन्हें बचाने के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं। अच्छी खबर ये है कि हाल के सालों में इनकी संख्या थोड़ी सी बढ़ी है।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित है। टाइम्स नाउ नवभारत किसी भी प्रकार के दावे की पुष्टि नहीं करता है।
