भारत की 2011 क्रिकेट विश्व कप विजेता टीम और पेरिस ओलंपिक में पुरुष हॉकी टीम के कांस्य पदक अभियान का हिस्सा रहे मानसिक अनुकूलन कोच पैडी अप्टन का मानना है कि टीम को टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही चैंपियन वाली सोच विकसित करनी होगी। उन्होंने भाषा से विशेष साक्षात्कार में कहा, "सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चैंपियन किसी टूर्नामेंट में चैंपियन की सोच लेकर ही आते हैं। वे यह साबित करने के लिए कि वे चैंपियन हैं, फाइनल जीतने का इंतजार नहीं करते।"
पैडी अप्टन (Instagram/Paddyupton)
अप्टन ने कहा, "हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम किसी भी अन्य टीम की तरह फिट हों, हमारा आहार किसी भी अन्य टीम की तरह अच्छा हो तथा नींद और आराम के मामले में हमारा ध्यान विश्व चैंपियन मानकों के अनुरूप हो।" उन्होंने यह भी कहा कि क्रिकेटरों और हॉकी खिलाड़ियों को तैयार करने में सबसे बड़ा अंतर टीम की गतिशीलता में निहित है। अप्टन ने कहा कि जहां क्रिकेट में अक्सर महत्वपूर्ण क्षणों में जिम्मेदारी किसी एक खिलाड़ी या छोटे समूह पर होती है वहीं हॉकी में निरंतर तालमेल और सामूहिक जिम्मेदारी की जरूरत होती है।
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ा अंतर यह है कि क्रिकेट में अधिकांश काम खिलाड़ी के व्यक्तिगत प्रदर्शन पर केंद्रित होता है, जबकि हॉकी में टीम का प्रदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है। किसी खिलाड़ी की मानसिकता उसके आसपास के खिलाड़ियों को कैसे प्रभावित करती है, यह बहुत महत्वपूर्ण है।" अप्टन ने कहा, "हॉकी में आप एक टीम के रूप में लगातार एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं, जबकि क्रिकेट में जब दो खिलाड़ी बल्लेबाजी कर रहे होते हैं, तो जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। इसी तरह से गेंदबाजी करते समय सारा भार गेंदबाज पर होता है।"
भारत के 2011 क्रिकेट विश्व कप अभियान का हिस्सा रहे दक्षिण अफ्रीका के इस दिग्गज ने कहा कि अब ध्यान फाइनल के बारे में सोचने पर नहीं है, बल्कि उन सभी चीजों के लिए तैयारी करने पर है जो भारत और खिताब के बीच बाधा बन सकती हैं। उन्होंने कहा, ’’अभी हमारा ध्यान फाइनल जीतने पर नहीं है। हम उन सभी चीजों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जिनसे हमें फाइनल तक पहुंचने का मौका मिल सके। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है आगे आने वाली बाधाओं और चुनौतियों के लिए तैयारी करना।"
अप्टन ने पेरिस ओलंपिक के संदर्भ में कहा कि ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ क्वार्टर फाइनल टीम के लिए सबसे बड़े सबक में से एक था। भारत ने इन खेलों में कांस्य पदक जीता था। उन्होंने कहा, ’’पेरिस ओलंपिक के क्वार्टर फाइनल में ब्रिटेन के खिलाफ भारत ने ऐसी स्थिति में मैच जीता, जिसमें कोई और टीम जीत नहीं सकती थी। क्योंकि हमने अभ्यास शिविर में उन्हें ऐसी स्थितियों के लिए तैयार किया था।"
भारतीय टीम ने 2024 पेरिस ओलंपिक के क्वार्टर फाइनल में ग्रेट ब्रिटेन को 1-1 (4-2 पेनल्टी शूटआउट) से हराकर एक यादगार जीत दर्ज की, जबकि वे मैच के ज़्यादातर समय एक खिलाड़ी कम होने के बावजूद खेल रहे थे। उन्होंने बताया कि स्विस आल्प्स में लगाए गए शिविर का उद्देश्य केवल कमजोरियों को सामने लाना नहीं था, बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों का एक साथ सामना करने की टीम की क्षमता को मजबूत करना था।
अप्टन ने कहा, ’’इसका मकसद कमजोरियों को दूर करना नहीं था। इसका उद्देश्य टीम भावना को और मजबूत करना और चुनौतियों व आशंकाओं के प्रति नजरिया बदलना था। अधिकतर टीमें हॉकी के मैदान पर विश्व कप की तैयारी करती हैं, लेकिन हमने शारीरिक और मानसिक रूप से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण परिस्थिति को चुना था।’’ उन्होंने कहा, ’’किसी भी खिलाड़ी का सबसे बड़ा डर थक जाना या चोट लग जाना हो सकता है। जब आप बहुत अधिक ऊंचाई पर हों और पूरी तरह थक चुके हों, तो आपके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। आपको आगे बढ़ते रहना ही पड़ता है। हम खिलाड़ियों को मैदान पर उनकी शारीरिक चुनौतियों से परे ले जाते हैं और चोट के डर को दूर करने में उनकी मदद करते हैं।’’
अप्टन के ने कहा, "अगर आप टीम के तौर पर काम नहीं करते, तो आपमें से कुछ की जान जा सकती है। इसी तरह, अगर आप मैदान पर टीम के तौर पर काम नहीं करते, तो आप टूर्नामेंट से बाहर हो सकते हैं।" खिलाड़ियों के व्यवहार में वह जिस तरह का बदलाव देखना चाहते हैं, वह भी उतना ही सरल है। उन्होंने कहा, ’’एक टीम के रूप में काम करें और अपने साथियों का बचाव करें। इसे एक नए स्तर पर ले जाएं।"
अप्टन का यह भी मानना है कि नॉकआउट मैचों में भारत का दृष्टिकोण स्कोरबोर्ड के बजाय प्रक्रिया पर केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने कहा, ’’नॉकआउट मैच किसी भी खेल में सबसे अधिक दबाव वाले मुकाबले होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपना स्वाभाविक खेल खेलें, अपनी रणनीति पर कायम रहे और अपने साथियों पर भरोसा रखें। अक्सर टीमें परिणाम पर इतना अधिक ध्यान लगा देती हैं कि वे अपने स्वाभाविक खेल को भूल जाती हैं।"
अप्टन के मानसिक प्रशिक्षण कार्य में तकनीक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने स्वयं का एक ’डिजिटल ट्विन’ बनाया है, जिससे खिलाड़ी चौबीसों घंटे उनकी सोच और मार्गदर्शन का लाभ उठा सकते हैं। उन्होंने कहा, ’’मैंने अपना एक डिजिटल ट्विन बनाया है जो केवल मेरी सोच और मेरी शैली का उपयोग करता है। इससे मैं सभी 20 खिलाड़ियों के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध रहता हूं। वे अंग्रेजी या हिंदी में बोल या टाइप कर सकते हैं। यह उन्हें बहुत ही निष्पक्ष और सीधा फीडबैक देता है।"
जब उनसे पूछा गया कि क्या मौजूदा भारतीय टीम में वही मनोवैज्ञानिक भावना है जो उन चैम्पियनशिप टीमों में थी जिनके साथ उन्होंने काम किया है, तो अप्टन ने सतर्क लेकिन आशावादी रुख अपनाया। उन्होंने कहा, ’’विश्व कप जैसे टूर्नामेंट में, छह टीमें ऐसी होती हैं जिनके फाइनल में पहुंचने की अच्छी संभावना होती है। सेमीफाइनल और फाइनल में कोई भी टीम जीत सकती है।’’ अप्टन का फिलहाल खिलाड़ियों को यही सलाह है कि वह बाहरी प्रतिक्रियाओं पर ध्यान नहीं दें और उन्हीं चीजों पर ध्यान केंद्रित करें जो उनके नियंत्रण में हैं।
(भाषा)
