ICC Champions Trophy White Coat Significance: आईसीसी के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट चैंपियंस ट्रॉफी 2025 का बिगुल बज चुका है और टीमों के साथ-साथ फैंस भी इसे लेकर काफी उत्साहित हैं। इसकी शुरुआत 19 फरवरी 2025 से होने वाली है वहीं खिताबी मुकाबला 9 मार्च 2025 को खेला जाएगा। इस मेगा टूर्नामेंट के लिए आईसीसी द्वारा हाल ही में एक प्रोमो जारी किया गया है जिसमें पाकिस्तान के दिग्गज गेंदबाज विजेताओं के लिए सफेद कोट तैयार करवा रहे हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि चैंपियंस ट्रॉफी के विजेताओं को आखिरकार सफेद कोट ही क्यों पहनाया जाता है और क्या है इसका महत्व?
सफेट जैकेट क्यों पहनते हैं चैंपियंस ट्रॉफी के विजेता (फोटो- ICC)
2013 में चैंपियंस ट्रॉफी जीत के बाद महेंद्र सिंह धोनी और पूरी भारतीय टीम की सफेद जैकेट में ट्रॉफी लिए फोटो आज भी हर भारतीय फैन के जहन में रहती है। इस सफेद जैकेट को देखकर हर खिलाड़ी का सीना चौड़ा हो जाता है। चैंपियंस ट्रॉफी में हालांकि हमेशा विजेताओं को जैकेट नहीं पहनाया जाता था। इसकी शुरुआत 2009 में हुई थी जब ऑस्ट्रेलिया ने द.अफ्रीका को हराने के बाद सफेद कोट पहना था। आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी।
2013 जीत के बाद भारतीय टीम द्वारा पहना गया सफेद कोट (फोटो- ICC)
इन वजहों से सफेद कोट पहनते हैं चैंपियंस ट्रॉफी के विजेता
आईसीसी के मुताबिक सफेद कोट चैंपियन द्वारा पहना जाने वाला सम्मान का प्रतीक है। ये सफेद जैकेट जीतना जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने की यात्रा को दर्शाता है।” चैंपियंस ट्रॉफी में हर मैच का महत्व होता है और ये दुनिया की टॉप 8 टीमों के बीच खेला जाता है ऐसे में इसे जीतने के लिए हर खिलाड़ी को चैंपियन की तरह खेलना पड़ता है और जीत के बाद ये सफेद कोट संघर्ष को दर्शाता है। इसके अलावा भी सफेद कोट पहनने के पीछे की वजह है आइए जानते हैं।
खेल भावना को दर्शाता है सफेद रंग
क्रिकेट को 'जेंटलमैन्स गेम' कहा जाता है, और सफेद रंग शुद्धता, ईमानदारी और निष्पक्षता का प्रतीक माना जाता है। जब चैंपियंस ट्रॉफी के विजेता सफेद कोट पहनते हैं, तो यह न केवल उनकी जीत का उत्सव होता है, बल्कि उनके खेल भावना और अनुशासन का सम्मान भी होता है।
ऐतिहासिक परंपरा
सफेद कोट पहनने की परंपरा इंग्लिश क्रिकेट से शुरू हुई, जहां शुरुआती दिनों में टेस्ट मैचों में खिलाड़ी सफेद कपड़े पहनते थे। यह क्रिकेट की परंपरा को आधुनिक दौर में भी जोड़े रखने का एक तरीका है। चैंपियंस ट्रॉफी में इसे शामिल करने का उद्देश्य क्रिकेट की ऐतिहासिक जड़ों को सम्मान देना है। चैंपियंस ट्रॉफी भले ही 1998 में शुरू हो गई थी लेकिन 2009 से इसके विजेताओं को सफेद कोट पहनाया जाने लगा।
ऑस्ट्रेलियाई टीम द्वारा 2009 में सबसे पहली बार पहना गया सफेद कोट (फोटो- ICC)
विजेताओं की अलग पहचान
सफेद कोट विजेताओं की एक अनूठी पहचान बनाता है। यह दर्शकों और प्रशंसकों को याद दिलाता है कि किस टीम ने इस प्रतिष्ठित ट्रॉफी को जीता है। सफेद कोट की यह परंपरा विजेताओं को अन्य टीमों से अलग पहचान देती है साथ ही इस टूर्नामेंट को भी अलग बताती है।
टूर्नामेंट की मार्केंटिंग का हिस्सा
सफेद कोट न केवल परंपरा का हिस्सा है, बल्कि यह एक मजबूत ब्रांडिंग का हिस्सा भी है। जब विजेता टीम सफेद कोट पहनती है और अपनी तस्वीरें खिंचवाती है, तो वह तस्वीरें मीडिया और सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं, जो टूर्नामेंट की लोकप्रियता को और बढ़ाती हैं। इससे टूर्नामेंट का महत्व और भी बढ़ जाता है और आईसीसी को कमाई का मौका मिल जाता है।
खिलाड़ियों की मेहनत को मिलता है सम्मान
चैंपियंस ट्रॉफी जैसे बड़े टूर्नामेंट को जीतने के लिए खिलाड़ियों को कड़ी मेहनत और अनुशासन का पालन करना पड़ता है। सफेद कोट उनके प्रयासों और बलिदानों का प्रतीक बन जाता है। यह उन्हें याद दिलाता है कि उनकी मेहनत का फल उन्हें मिला है। खिलाड़ी जो ट्रॉफी जीतते हैं वो तो बोर्ड के कार्यालय में रखी जाती है लेकिन कोट हमेशा हर प्लेयर के पास रहता है।
