Yaum-e-Ashura Se Chehallum Tak Kya Kare : इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम केवल नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह त्याग, सब्र, न्याय और अल्लाह की राह में कुर्बानी की याद भी दिलाता है। मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी यौम-ए-आशूरा का दिन इस्लामी इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन कर्बला की धरती पर हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने सत्य, न्याय और इंसाफ की रक्षा के लिए अपनी शहादत दी थी।
चेहल्लुम तक क्या करना चाहिए
यौम-ए-आशूरा के बाद लगभग 40 दिनों तक चलने वाला समय चेहल्लुम (अरबईन) तक गम, आत्ममंथन, इबादत और इंसानियत के संदेश को याद करने का दौर माना जाता है। अलग-अलग इस्लामी परंपराओं में इसकी अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न हो सकते हैं, लेकिन सब्र, नेक अमल और अल्लाह की इबादत पर सभी का समान जोर है। आइए जानते हैं कि इस अवधि में इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार किन बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है।
यौम-ए-आशूरा से चेहल्लुम तक क्या करें
इस्लामी इतिहास में कर्बला की घटना केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि सत्य और अन्याय के बीच संघर्ष का प्रतीक मानी जाती है। हज़रत इमाम हुसैन ने अत्याचार के सामने झुकने के बजाय शहादत को स्वीकार किया। इसी कारण आशूरा से चेहल्लुम तक का समय मुसलमानों के लिए इमाम हुसैन की कुर्बानी, उनके आदर्शों और अल्लाह की राह में दृढ़ रहने की प्रेरणा का काल माना जाता है। इस दौरान अनेक मुस्लिम समुदाय इबादत, दुआ, कुरआन की तिलावत और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं। जहां शिया मुस्लिम इस दौरान मातम मनाते हैं। वहीं, सुन्नी समुदाय के लोग इस दौरान अल्लाह की ज्यादा से ज्यादा इबादत करने की कोशिश करते हैं।
इबादत और कुरआन की तिलावत पर दें विशेष ध्यान
इस अवधि में नियमित नमाज अदा करना, कुरआन शरीफ की तिलावत करना और अल्लाह से दुआ करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार व्यक्ति को केवल शोक व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने आचरण, चरित्र और ईमान को भी मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिए। उलेमा भी इस दौरान अल्लाह की इबादत, तौबा और नेक अमल की ओर अधिक ध्यान देने की सलाह देते हैं।
सदका और जरूरतमंदों की मदद
इस्लाम में सदका (दान) और जरूरतमंदों की सहायता हर समय सवाब का कार्य माना गया है, लेकिन आशूरा से चेहल्लुम के बीच गरीबों, यतीमों और जरूरतमंद लोगों की मदद करने पर विशेष बल दिया जाता है। इस दौरान मुस्लिमों को अपनी क्षमता के अनुसार भोजन कराना, पानी पिलाना, जरूरतमंद परिवारों की सहायता करना और समाज सेवा के कार्य करना चाहिए। यह इमाम हुसैन की कुर्बानी से मिलने वाली इंसानियत की सीख का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
इमाम हुसैन के संदेश को जीवन में उतारने का करें प्रयास
इस अवधि का सबसे बड़ा संदेश केवल इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि उससे सीख लेना है। इस्लामी विद्वानों के अनुसार मुसलमानों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने, सच बोलने, ईमानदारी अपनाने, सब्र रखने और इंसाफ का साथ देने का संकल्प लेना चाहिए। इमाम हुसैन की शहादत को सत्य और न्याय की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान के रूप में देखा जाता है। इसलिए इस दौरान उनके आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारने की प्रेरणा दी जाती है।
मजलिस और धार्मिक सभाओं में लें भाग
विशेष रूप से शिया समुदाय में आशूरा से चेहल्लुम तक मजलिसों का आयोजन किया जाता है। इन सभाओं में कर्बला की घटना, इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत तथा उनके संदेशों का वर्णन किया जाता है। वहीं सुन्नी समुदाय भी आशूरा के महत्व, इबादत और पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत से जुड़ी बातों पर विशेष ध्यान देता है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार इन धार्मिक आयोजनों की शैली अलग-अलग हो सकती है।
इन बातों से करें तौबा
अधिकतर मुस्लिम समुदाय इस अवधि में बड़े उत्सव, अनावश्यक दिखावा और फिजूलखर्ची करने से बचते हैं। इन पूरे 40 दिनों को शोक के दिन माना गया है।
चेहल्लुम तक मनाया जाता है शोक
चेहल्लुम, जिसे अरबईन भी कहा जाता है, इमाम हुसैन की शहादत के 40वें दिन मनाया जाता है। यह दिन कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने और उनके संदेश सत्य, सब्र, न्याय और इंसानियत को याद करने का अवसर माना जाता है। इसके बाद से निकाह, दावत आदि कार्यक्रमों को किया जा सकता है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी इस्लामिक मान्याताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
