Kaun Se Mandir Grahan Mei Band Nahi Hote hai: आज वर्ष 2026 का पहला पूर्ण चंद्रग्रहण लग रहा है। यह ग्रहण सिंह राशि और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में घटित हो रहा है। दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से शुरू होकर शाम 6 बजकर 46 मिनट तक इसका प्रभाव रहेगा। सूतक काल लगभग 9 घंटे पहले, यानी सुबह 6 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ हो चुका है।
इन मंदिरों पर नहीं होता ग्रहण का असर
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के समय अधिकतर मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं और नियमित पूजा-अर्चना रोक दी जाती है। लेकिन कुछ प्राचीन और विशिष्ट मंदिर ऐसे भी हैं, जहां ग्रहण के दौरान भी कपाट बंद नहीं किए जाते। इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यता और परंपरा जुड़ी हुई है।
ग्रहण में मंदिर क्यों बंद किए जाते हैं?
शास्त्रों में ग्रहण काल को संवेदनशील समय माना गया है। इस दौरान देवी-देवताओं की मूर्तियों को ढक दिया जाता है और पूजा स्थगित कर दी जाती है। मान्यता है कि ग्रहण के समय वातावरण में सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं, इसलिए मंदिरों की शुद्धता बनाए रखने के लिए यह नियम अपनाया जाता है।
हालांकि कुछ स्थानों पर यह मान्यता लागू नहीं होती है। यहां ग्रहण को साधना, जप और विशेष अनुष्ठान का समय माना जाता है। दरअसल इन मंदिरों में ग्रह और नक्षत्र स्वयं ईश्वर के सामने सिर झुकाकर पेश होते हैं।
महाकालेश्वर मंदिर
उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि महाकाल स्वयं समय के स्वामी हैं। मान्यता है कि जब भगवान शिव काल के अधिपति हैं, तो ग्रहण जैसे खगोलीय योग का इस मंदिर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी कारण यहां ग्रहण के दौरान भी मंदिर के पट पूरी तरह बंद नहीं किए जाते है। पूजा और जप की प्रक्रिया जारी रहती है।
कालकाजी मंदिर
दिल्ली का प्रसिद्ध कालकाजी मंदिर मां कालका को समर्पित है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि देवी कालचक्र की अधिष्ठात्री हैं और ग्रह-नक्षत्र उनके अधीन हैं। इसी कारण यहां ग्रहण के समय भी दर्शन पूरी तरह बंद नहीं किए जाते हैं। भक्त ग्रहण काल में भी माता के दरबार में उपस्थित होकर मानसिक जप और प्रार्थना करते हैं।
कल्पेश्वर मंदिर
उत्तराखंड के पंचकेदारों में शामिल कल्पेश्वर मंदिर भी विशेष महत्व रखता है। यह स्थान भगवान शिव से जुड़ा प्राचीन तीर्थ है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यहां ग्रहण के समय मंदिर बंद नहीं किया जाता। श्रद्धालु मानते हैं कि यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है और ग्रहण के दौरान यहां जप-तप का विशेष फल मिलता है।
थिरुवरप्पु श्रीकृष्ण मंदिर
केरल के कोट्टायम में स्थित यह मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां भगवान श्रीकृष्ण को दिन में कई बार भोग अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि भगवान को समय पर भोग लगाना आवश्यक है, इसलिए ग्रहण के दौरान भी मंदिर के कपाट बंद नहीं किए जाते हैं। नियमित पूजा और भोग की परंपरा जारी रहती है।
विष्णुपद मंदिर
गया का विष्णुपद मंदिर पितृ कर्म और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है। यहां ग्रहण काल में भी श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। ऐसी मान्यता है कि ग्रहण के समय पिंडदान और जप का विशेष फल मिलता है। इस कारण यहां मंदिर पूरी तरह बंद नहीं किया जाता, बल्कि धार्मिक गतिविधियां नियंत्रित रूप में जारी रहती हैं।
लक्ष्मीनाथ मंदिर
राजस्थान के बीकानेर स्थित लक्ष्मीनाथ मंदिर से जुड़ी एक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार ग्रहण के दौरान मंदिर बंद कर दिया गया और भगवान को भोग नहीं लगाया गया, जिसके बाद भगवान ने हलवाई के सपने में खुद के भूखे रहने की बात कही। उस दिन उसके बाद से परंपरा चली कि ग्रहण काल में भी यहां कपाट बंद नहीं किए जाते हैं और भगवान की सेवा और भोग लगता रहता है।
