Sawan Month: बारिश, हरियाली, झूले, कांवड़ यात्रा और शिव मंदिरों में जलाभिषेक- सावन आते ही पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। लेकिन इस महीने का सही नाम सावन है या श्रावण? इसका नाम कैसे पड़ा और यह भगवान शिव का प्रिय महीना क्यों माना जाता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।
सावन या श्रावण - जानें इस मास का सही नाम क्या है
सावन का सही नाम क्या है
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज कहते हैं कि इस महीने का मूल और शास्त्रीय नाम श्रावण है। धार्मिक ग्रंथों, पंचांग और पूजा के संकल्प में इसे श्रावण मास कहा जाता है। वहीं सावन इसी शब्द का सरल और बोलचाल वाला रूप है।
समय के साथ लोकभाषा में श्रावण बदलकर सावन हो गया। इसलिए दोनों नाम सही हैं। अंतर केवल इतना है कि ‘श्रावण’ शास्त्रीय नाम है, जबकि ‘सावन’ आम बोलचाल, लोकगीतों और कहानियों में अधिक इस्तेमाल होता है।
श्रावण मास का नाम कैसे पड़ा
हिंदू पंचांग के महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं। मान्यता है कि इस महीने की पूर्णिमा के आसपास चंद्रमा श्रवण नक्षत्र के निकट रहता है। इसी कारण इस चंद्र मास को श्रावण कहा गया।
श्रवण 27 नक्षत्रों में से एक है। संस्कृत में श्रवण का अर्थ सुनना और किसी बात को ध्यान से ग्रहण करना भी होता है। आध्यात्मिक रूप से यह महीना मन को शांत करके अपने भीतर की आवाज सुनने का संदेश देता है।
सावन और श्रावण में क्या अंतर है
सावन और श्रावण दो अलग-अलग महीने नहीं हैं। दोनों एक ही महीने के नाम हैं।
- श्रावण इसका संस्कृत और पंचांग में इस्तेमाल होने वाला नाम है।
- सावन इसका हिंदी और लोकभाषा में प्रचलित रूप है।
- पूजा-संकल्प में श्रावण मास कहा जाता है।
- गीतों और आम बातचीत में सावन अधिक सुनाई देता है।
सावन भगवान शिव का प्रिय महीना क्यों है
सावन को भगवान शिव से जोड़ने वाली सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन की है। पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान हलाहल नाम का अत्यंत घातक विष निकला। उस विष के प्रभाव से सृष्टि पर संकट आ गया।
संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने विष पी लिया। माता पार्वती ने विष को उनके कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया। इससे शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।
धार्मिक मान्यता है कि विष की गर्मी को शांत करने के लिए देवी-देवताओं ने भगवान शिव पर जल अर्पित किया। इसी भाव से सावन में शिवलिंग पर जल और गंगाजल चढ़ाने की परंपरा जोड़ी जाती है।
सावन में शिवलिंग पर जल क्यों चढ़ाया जाता है
शिवलिंग पर जल चढ़ाना शीतलता, श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है। भक्त जलाभिषेक करके भगवान शिव से जीवन के दुख, क्रोध और नकारात्मकता को शांत करने की प्रार्थना करते हैं।
इसका एक व्यावहारिक संदेश भी है। सावन वर्षा का महीना है और जल जीवन का आधार है। जलाभिषेक मनुष्य को प्रकृति और पानी के महत्व की याद दिलाता है।
सावन का माता पार्वती से क्या संबंध है
प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनके समर्पण से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
इसलिए सावन को शिव और शक्ति की संयुक्त आराधना का महीना माना जाता है। सावन सोमवार को भगवान शिव और मंगलवार को माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है।
सावन सोमवार का व्रत क्यों रखा जाता है
सोमवार भगवान शिव को समर्पित दिन माना जाता है। सावन में सोमवार का महत्व और बढ़ जाता है। श्रद्धालु सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ति के लिए व्रत रखते हैं। हालांकि व्रत का अर्थ केवल भूखा रहना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना, सात्विक भोजन करना, क्रोध से बचना और पूजा-पाठ में मन लगाना है।
उत्तर और दक्षिण भारत में सावन की तारीख अलग क्यों होती है
भारत में चंद्र मास की गणना मुख्य रूप से दो पद्धतियों से होती है- पूर्णिमांत और अमांत। उत्तर भारत में कई स्थानों पर महीना पूर्णिमा के बाद शुरू माना जाता है। पश्चिम और दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों में अमावस्या के बाद नए महीने की शुरुआत होती है।
इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में श्रावण मास की आरंभ और समाप्ति की तारीखें अलग हो सकती हैं। यह कोई पंचांग की गलती नहीं, बल्कि गणना की अलग परंपरा है।
सावन मास का संदेश क्या है
सावन केवल पूजा और व्रत का महीना नहीं है। यह संयम, साधना और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का समय है। भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए विष को अपने कंठ में रोक लिया था। इस कथा का संदेश है कि हमें भी क्रोध, कटुता और नकारात्मकता को समाज में फैलाने से बचना चाहिए।
