Roop Chaudas 2026: दीपावली का त्योहार केवल दीपों की रोशनी और खुशियों का उत्सव नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी हर परंपरा अपने भीतर कोई न कोई धार्मिक और आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है। दिवाली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली रूप चौदस भी ऐसा ही खास पर्व है। इसे नरक चतुर्दशी, छोटी दिवाली और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व का संबंध जहां एक ओर बुराई पर अच्छाई की जीत से है, वहीं दूसरी ओर सुंदरता, आरोग्य और अकाल मृत्यु से मुक्ति की कामना से भी जुड़ा है।
रूप चौदस कब मनाई जाती है?
इस दिन घरों में दीप जलाए जाते हैं, सुबह जल्दी उठकर विशेष स्नान किया जाता है और यमराज के नाम का दीपदान करने की परंपरा निभाई जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर रूप चौदस क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे कौन-कौन सी पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं? आइए जानते हैं इस पर्व का धार्मिक महत्व और इससे जुड़ी खास परंपराएं।
रूप चौदस की पौराणिक कथा
रूप चौदस मनाने के पीछे सबसे प्रमुख मान्यता भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर से जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर नाम का एक अत्याचारी असुर था, जिसने अपने आतंक से देवताओं और मनुष्यों को परेशान कर रखा था। उसने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना लिया था और तीनों लोकों में भय का वातावरण पैदा कर दिया था।
नरकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ लेकर नरकासुर का वध किया और उसकी कैद से 16 हजार कन्याओं को मुक्त कराया। मान्यता है कि यह घटना कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन हुई थी। तभी से इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाने लगा। यह पर्व संदेश देता है कि अत्याचार और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंत में विजय सत्य और धर्म की ही होती है।
रूप चौदस कैसे पड़ा नाम?
नरक चतुर्दशी को रूप चौदस कहने के पीछे सुंदरता और सौंदर्य से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं। मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर शरीर पर तिल के तेल की मालिश करनी चाहिए। इसके बाद उबटन लगाकर विशेष स्नान करने की परंपरा है। धार्मिक परंपराओं में स्नान के पानी में अपामार्ग यानी चिरचिरी के पत्ते डालने का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि इस विधि से स्नान करने पर व्यक्ति को रूप-सौंदर्य की प्राप्ति होती है और जीवन में आरोग्य एवं सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसी वजह से इस दिन को रूप चौदस या रूप निखारने वाला पर्व भी कहा जाता है।
यमराज के नाम का दीप जलाने की परंपरा
रूप चौदस का एक महत्वपूर्ण धार्मिक पक्ष यम दीपदान भी है। मान्यता है कि इस दिन मृत्यु के देवता यमराज के नाम से दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार के सदस्यों पर उनकी कृपा बनी रहती है।
परंपरा के अनुसार, शाम के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है। इसे यम का दीया कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। इसलिए इस दिशा में दीपदान करने का विशेष महत्व बताया गया है। लोग परिवार की सुख-शांति, दीर्घायु और सुरक्षा की कामना करते हुए यह परंपरा निभाते हैं।
छोटी दिवाली के नाम से है पहचान
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहा जाता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई और सजावट की जाती है। शाम होते ही घरों के आंगन, दरवाजों और पूजा स्थलों पर दीपक जलाए जाते हैं। कई जगहों पर रंगोली बनाई जाती है और परिवार के लोग मिलकर त्योहार की खुशियां मनाते हैं। यह दिन मुख्य दीपावली के स्वागत का अवसर भी होता है। घरों को रोशनी से सजाने के साथ लोग मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की तैयारियां करते हैं।
