Astrology: ज्योतिष विज्ञान प्रकृति के बहुत से रहस्यों को खोलता है जिसे सनातन ऋषियों ने पूर्ण रूप से जाना था। शरीर के संचालन में अंतरिक्ष में चक्कर लगाते ग्रहों के निर्धारण पर ही आयु, स्वास्थ्य, विचार आदि निर्भर होते हैं। मानव का जीवन चक्र उनकी धाराओं पर ही चलता है। विचार और स्वास्थ्य दोनों ही मानव के हाथ में नहीं हैं। सृष्टि सनातन विज्ञान की जानकारी रखें तो प्रदूषण मुक्त स्वस्थ दीर्घायु जीवन व्यतीत कर सकती है। आइये आपको बताते हैं कि ग्रहों की चाल किस तरह से आपके जीवन की सुर ताल को बनाए और बिगाड़ कर रख सकती है।
ग्रह नक्षत्र की चाल
सूर्य
अध्यात्म जीवन के प्राण तत्वों का निर्माता सूर्य ही है। सृष्टि में पौधों का पोषण सूर्य के द्वारा ही संभव है। पौधाें की पत्तियों में पाया जाने वाला पर्णहरित सूर्य के प्रकाश की किरणों से कार्बन डाइऑक्साइड, पानी मिलकर प्राणवायु सृष्टि में दे रहे हैं। पोषण पदार्थ ग्लूकोज, फ्रुक्टोज, सुक्रोज एवं विभिन्न तत्वों की मात्रा से शरीर चलता है, यह सूर्य की ही देन है। विज्ञान में एकमात्र में सूर्य की दो प्रतिशत ऊर्जा से संसार चल रहा है।
चंद्रमा
चंद्रमा शरीर में प्राण तत्व का निर्माता है। पेड़− पौधों में रस प्रदान करना एवं एंजाइम, हार्मोन, मानव में विचार शक्ति प्रदान करना, यह चंद्र का ही प्रभाव है। यह मन का देवता कहलाता है। चंद्र प्रकाश की आवृत्ति समुद्र के साथ मानव जीवन के विचारों पर प्रभाव डालती है। इसलिए चंद्र के प्रकाश की आवृत्ति ही संसार में परिवर्तन लाती है।
मंगल
मंगल की प्रवाह शक्ति ही संसार में बीज उत्पन्न कर रही है। मन की इच्छाओं पर नियंत्रण रखने के लिए ही सनातन संस्कार में लाल कुमकुम की बिंदी लगाते हैं। शरीर के आकर्षण के हार्मोन ही उमंग एवं मिलन के लिए उत्तरदायी हैं। मन में काम भावनाएं जगाने के लिए मंगल की अज्ञात प्रकाश आवृत्तियां कार्य करती हैं।
बुध
बुध मन के विकास की गति का अभिदाता है। बुध ही वह ग्रह है जो सूक्ष्मतर भावों को जगाता है। इसलिए बुधवार को श्रीगणोश की आराधना कर अपनी चिंतन शक्ति को मजबूत करते हैं। बुध ही वो ग्रह जो यदि प्रबल हो तो अनुसंधान करवा सकता है। बुध कार्य विस्तार देता है। चेतना अंगों पर नियंत्रण रखता है।
गुरु
गुरु यानी बृहस्पति का पीला रंग जीवन शैली में भावनात्मक विकास के लिए उत्तरदायी है। आत्मविश्वास की चेतना जाग्रत करने के लिए गुरु की प्रबलता आवश्यक है। इसलिए सनातन धर्म में आत्मविश्वास बनाए रखने के लिए गुरु दीक्षा की परंपरा है। सबसे आवश्यक बात गुरु की आवृत्तियां आध्यात्मिक चिंतन का सूक्ष्मतर भाव जगाने की क्षमता रखती है।
शुक्र
शुक्र आंतरिक क्षमताओं का बाेधक है। शरर के परिवहन तंत्र में मांस, मज्जा, रक्त प्रवाह, यकृत रस, हार्मोन्स संतति के लिए शुक्राणु, अंडाणु विसर्जन आदि के लिए शुक्र आवृत्ति अनिवार्य है। शुक्र यदि कमजोर होता है तो व्यक्ति अंतर्मुखी हो जाता है।
शनि
शनि शरीर के अंगों का निर्माता है। शरीर के विभिन्न अंग एवं उनसे निकलने वाले रस एवं शरीर क्षमता का सारा भार शनि आवृत्ति में होता है। ज्योतिष विज्ञान ने इसकी सीमा ढाई वर्ष एवं साढ़े वर्ष स्पष्ट की है।
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