Navratri Saraswati Avahan 2023 Puja Vidhi: शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां काली की पूजा की जाती है। वे उनके लिए व्रत भी रखते हैं। निशा काल में मां काली की पूजा की जाती है। वहीं, नवरात्रि के सातवें दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। इस साल सरस्वती पूजा का आवाहन 20 अक्टूबर को हो रहा है। 21 को सरस्वती पूजा की जाएगा और 22 अक्टूबर को सरस्वती विसर्जन किया जाएगा। इस दिन भक्त भक्तिभाव से देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। तांत्रिक मंत्र का अध्ययन करने वाले लोग रात्रि में मां काली की विशेष पूजा भी करते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं सरस्वती आवाहन की पूजा विधि के बारे में।
Navratri Saraswati Avahan 2023 Puja Vidhi ( सरस्वती आवाहन पूजा विधि)
सरस्वती आवाहन के दिन, लोग सुबह जल्दी उठते हैं और सबसे पहले स्नान करते हैं। इसके बाद सबसे पहले मंदिर को गंगा जल से साफ किया जाता है। इसके बाद देवी सरस्वती की मूर्ति या फोटो स्थापित करें। इसके बाद मां सरस्वती के सामने धूप, अगरबत्ती आदि जलाएं। इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। देवी सरस्वती का पसंदीदा रंग सफेद है, इसलिए उन्हें सफेद मिठाई अर्पित की जाती है। इसके बाद मां सरस्वती के मंत्र का जाप करें। अंत में देवी सरस्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें।
सरस्वती अष्टक का करें पाठ
अम्ब, थ्वदेय पद पङ्कज पांसु लेस,
संबन्द बन्दुरथरा रसना थ्वधीयम् ।
संभयुधधिपदमप्य अम्रुथथि रम्यं,
निम्भयथे किमुथ भोउम पदानि थस्य ॥
मथ, स्थ्वधेय करुनंरुथ पूर्ण दृष्टि,
अथक्वचिद्विधि वसन मनुजे न चेतः स्यतः ।
का थस्य घोर अपि धभ्यवाःअरनिध्र,
भीथ्यधिकेषु समा भवमुपेयिवल्सु ॥
वनि रेम गिरि सुथेथि च रूप भेदि,
क्षोणी जुषां विविध मङ्गल माध धासि ।
ननीयसीं थ्व विभुथिमहो विवेक्थुं,
क्षीनिभवथ्यकृथकोपि वच प्रपञ्च ॥
सर्वग्नाथ गिरि सुथ कमिथिर विपक्ष,
गर्वचिधकुसलथदिविशद गुरोस्च ।
चर्वार्थ सबध घटना पतुथ कवीनां,
सर्वं थ्वधीय करुणा कनिक विवर्थ ॥
मूक कविर्जद इह प्रथि भवधग्र्यो,
भीकुन्द दुर्भलमधिर धरणी विज्हेथ ।
निष्किञ्चनो निधिपधिर भवथि थ्वधीय,
मेकं कदक्षमवलंभ्य जगथ्सविथ्री ॥
वर्णथ्मिके, हिम सुधाकर संख कुण्ड,
वर्नभि राम थानु वल्लरी विस्व वन्ध्ये ।
कर्णाथ दीर्घ करुनर्ध्र कदक्ष पथि,
पूर्ण अखिलर्थमिम मासु विदथ्स्व देवी ॥
कालं कियन्थमयि थेय चररविन्ध,
मलंभ्य हन्थ विलपामि विलोलचेथ ।
बलं कुरुश्व कृथा कृथ्यमिमं शुभिअक,
मूलं निधाय करुअर्ध्र मपन्गमस्मिन ॥
आनन्द हेथु मयि थेय करुणां विहाय,
नूनं न किन्चिदखिलेसि विलोकयामि ।
धूनं दयर्हमगथिं करुनंरुथद्रै,
रेनं शिशुं शिशिरयषु कदक्षपत्है ॥
इमं पदेध्य प्रयथस्थावोध्घ,
मनन्य चेथ जगथं जनन्य ।
स विध्वधरधिथ पद पीते,
लभेथ सर्वं पुर्षर्थसर्थं ॥
