Mohini Ekadashi Vrat Katha 2025 (मोहिनी एकादशी व्रत कथा): मोहिनी एकादशी के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु इसकी पावन कथा को जरूर सुनते हैं। जिसके बिना ये व्रत अधूरा माना जाता है। कहते हैं जो व्रती सच्चे मन से इस व्रत को रखते हुए इसकी कथा को सुनता है उसे खूब पुण्य की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं इस व्रत कथा को सुनने मात्र से ही व्यक्ति को हजार गायों का दान करने जितना पुण्य प्राप्त हो सकता है। इस एकादशी की कथा महर्षि वशिष्ठ ने प्रभु राम को सुनाई थी। ये कथा इस प्रकार है...
Mohini Ekadashi Vrat Katha 2025 (मोहिनी एकादशी व्रत कथा)
मोहिनी एकादशी की पौराणिक कथा अनुसार एक समय श्रीराम बोले कि हे गुरुदेव! कोई ऐसा व्रत बताइए, जिससे मनुष्य के समस्त पाप और दु:ख का नाश हो जाए।महर्षि वशिष्ठ बोले: हे राम! आपकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध और पवित्र है। आपका नाम स्मरण करने मात्र से ही सारे दुखों का अंत हो जाता है, तब भी लोकहित में यह प्रश्न अच्छा है। इसलिए मैं आपको मोहिनी एकादशी व्रत के बारे में बताने जा रहा हूं। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इसका व्रत करने से मनुष्य सभी पापों और दुखों से छुटकारा पा लेता है। इसकी कथा में आपको बताता हूं।
सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी में द्युतिमान नामक चंद्रवंशी राजा रहा करता था। उसी नगर में धन-धान्य से संपन्न धनपाल नामक वैश्य भी रहता है। जो अत्यंत धार्मिक और विष्णु भक्त था। उसने नगर में कई भोजनालय, प्याऊ, कुएं, सरोवर, धर्मशाला आदि बनवाए। सड़कों पर कई तरह के वृक्ष लगवाए। उसके 5 पुत्र थे- सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि। लेकिन उसका पांचवां पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। वह पितरों को नहीं मानता था। वह बुरे मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेला करता था और पर-स्त्री के साथ भोग-विलास करता था। साथ ही मद्य-मांस का सेवन भी किया करता था। अपने पिता का सारा धन वह इन्हीं कुकर्मों में नष्ट करता रहता था।
एक दिन त्रस्त होकर उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया था। जिसके बाद वह अपने गहने और कपड़े बेचकर अपना निर्वाह करने लगा। जब उसका सब कुछ नष्ट हो गया तो उसके दुराचारी साथियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। जिसके बाद वह भूख-प्यासा इधर-उधर भटकने लगा और चोरी करना सीख गया। लेकिन एक बार वह चोरी करते पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मगर दूसरी फिर से पकड़ में आने पर राजाज्ञा से उसे कारागार में डाल दिया गया। बाद में राजा ने उसे नगरी से निकल जाने का कहा।
इसके बाद वह वन में चला गया। जहां वह वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। कुछ समय बाद वह बहेलिया बन गया और धनुष-बाण लेकर पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। एक दिन भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह खाने की तलाश में घूमता हुआ कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम में जा पहुंचा। उस समय वैशाख महीना था और ऋषि गंगा स्नान करके आ रहे थे। ऋषि के भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हुई।
वह कौण्डिन्य मुनि से हाथ जोड़कर अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछने लगा। उसके दीन वचन सुनकर मुनि ने कहा कि तुम वैशाख शुक्ल की मोहिनी एकादशी का व्रत करो। इससे तुम्हारे इसी जन्म नहीं बल्कि अनेक जन्मों के किये हुए महापाप भी नष्ट हो जाएंगे। मुनि के वचन सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने विधि विधान व्रत किया।
महर्षि वशिष्ठ बोले हे राम! इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक को गया। अत: जो भी इस व्रत को करता है उसके मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं। संसार में इस व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है। साथ ही जो इस व्रत की कथा को सुनता है उसे एक हजार गौदान का फल प्राप्त होता है।
