शादियों में मटकोड़ रस्म का महत्व: शादी-ब्याह के दौरान विभिन्न तरह की रस्में निभाई जाती हैं जिनका बड़ा ही गहरा सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक महत्व होता है। ये रस्में न केवल हमारी सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखती हैं, बल्कि सभी को एक साथ लाने और एकजुटता की भावना को मजबूत करने का भी काम करती हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही खास रस्म के बारे में बताने जा रहे हैं जो विशेष रूप से यूपी और बिहार की शादियों में निभाई जाती है। इस रस्म का नाम है मटकोड़। शास्त्रों अनुसार इस रस्म की झलक प्रभु राम और माता सीता के विवाह में भी देखने को मिलती है। चलिए जानते हैं इस रस्म के बारे में विस्तार से यहां।
मटकोड़ रस्म का महत्व क्या है?
'मटकोड़' हिंदू विवाह में निभाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण रस्म है, जो मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रचलित है। इसे माटी कोड़ने या मिट्टी से याचना करने की रस्म के नाम से भी जाना जाता है। इस रस्म के जरिए वर-वधु अपने नए जीवन की शुरुआत से पहले धरती माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह रस्म जीवन में स्थिरता, आर्थिक मजबूती और वैवाहिक सुख की नींव डालने का प्रतीक मानी जाती है।
कैसे निभाई जाती है ये रस्म?
मटकोड़ रस्म का स्वरूप हर जगह में एक जैसा नहीं होता। इसके रीति-रिवाजों में क्षेत्र के हिसाब से कुछ न कुछ भिन्नता देखने को मिलती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की बात करें वहां इस रस्म को बड़े ही खास तरीके से निभाया जाता है। यूपी के गाजीपुर की रहने वालीं 70 वर्षीय पुष्पा पांडेय बताती हैं 'कि इस रस्म के बिना यहां की शादियां अधूरी मानी जाती है। चाहे लड़का हो या लड़की दोनों की ही शादी में ये रस्म निभाना जरूरी होता है। हर गांव में इस रस्म को निभाने के लिए एक निश्चित जगह होती है। ये रस्म अमूमन तालाब के किनारे निभाई जाती है। जिस घर में शादी पड़ती है उस घर की 5 सुहागिन महिलाएं मटकोड़ रस्म को निभाने के लिए उस तय स्थान पर बांस की डलिया, सुपारी, सिंदूर, जल, अक्षत और कुल्हाड़ी लेकर जाती हैं।
बुआ खोदती हैं मिट्टी
इसके बाद दूल्हा या दुल्हन की बुआ कुल्हाड़ी से पांच बार मिट्टी खोदती है और छोटा सा जलाशय बनाती है। फिर भाभी उस मिट्टी में पानी भरती है और इसके बाद उसमें सुपारी और सिक्का डालती है। फिर दूल्हा या दुल्हन की आंखों को बंद करके उनसें मिट्टी में छुपाई गई सुपारी और सिक्का ढूंढने को कहा जाता है। भाभी पांच बार सिक्का और सुपारी वर या वधू के सिर से वारकर उस मिट्टी में डालती है और जिसकी शादी हो रही है उसे पांच बार ये चीजें ढूंढनी पड़ती है। कहते हैं जितना जल्दी दूल्हा या दुल्हन इन चीजों को खोज लेते हैं उतना ही उनका वैवाहिक जीवन अच्छा गुजरने के संकेत मिलते हैं। इस प्रक्रिया के बाद पांच सुहागिन महिलाएं वहां से मिट्टी उठाकर 5 जगह डलिया में रखती हैं। फिर सिंदूर और अक्षत से उन पांचों की पूजा करती हैं। फिर इस मिट्टी को घर लेकर आया जाता है। इसके बाद इससे चूल्हा तैयार किया जाता है जिसे मंडप के नीचे रखा जाता है। शादी के बाद इस चूल्हे पर कद्दू बोया जाता है। कहते हैं जितना अच्छा कद्दू इस चूल्हे पर लगता है उतना ही अच्छा वर-वधू का जीवन रहता है। समय के साथ-साथ इस रस्म के दौरान पीले वस्त्र पहनने का भी एक नया प्रचलन आ गया है।'
मटकोड़ रस्म का एक रूप ये भी
कुछ जगहों पर इस रस्म को निभाने के लिए महिलाएं समूह में मंगल गीत गाती हुई साथ में एक दउरी (डलिया) में जौ, पान, कसैली तथा पीला कपड़ा का एक टुकड़ा रख गांव के बाहर जाती हैं। इसके बाद वर या वधू की बुआ द्वारा जमीन से मिट्टी खोदने के साथ ही पांच महिलाओं का खोईंछा भी भरा जाता है। बुआ के नहीं रहने पर मिट्टी खोदने की रस्म वर या वधू की बहन निभाती है। इसके बाद खोदी गयी मिट्टी को बांस की डलिया में रख महिलाएं उसे घर ले आती हैं। फिर महिलाओं द्वारा साथ लायी गयी मिट्टी को घर के आंगन में रख पंडित जी के पूजा के बाद कलश स्थापित किया जाता है। बाद में दूल्हा और दुल्हन को हल्दी लगाई जाती है। मटकोड़ रस्म के दौरान लाई गई मिट्टी से चूल्हा बनाया जाता है और फिर उसमें लावा भूना जाता है।
राम-सीता विवाह में मटकोड़ की झलक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि यह रस्म भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह में भी निभाई गई थी। इसलिए इसका महत्व और भी खास माना जाता है। कहते हैं इस रस्म को निभाने से नए जोड़े को सभी देवी-देवताओं की आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
भूमि और प्रकृति की पूजा से जुड़ी है ये रस्म
हिंदू धर्म में भूमि यानी धरती माता को उर्वरता और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में पूजा जाता है। मटकोड़ रस्म में मिट्टी खोदना और उसे मंडप में स्थापित करना भूमि के प्रति सम्मान और नए जीवन की शुरुआत के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रतीक हो सकता है।
मटकोड़ रस्म का सांस्कृतिक महत्व
यह पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे निभाकर लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। मटकोड़ रस्म एक ऐसा अवसर प्रदान करती है जहां सभी मिलकर भाग लेते हैं, गीत गाते हैं और खुशियां मनाते हैं, जिससे सामुदायिक बंधन मजबूत होता है। यह रस्म विवाह के माहौल को शुभ और सकारात्मक बनाती है, जिससे सभी बाधाएं दूर हों।
मटकोड़ रस्म का भविष्य
शादी के मौजूदा समीकरणों में मटकोड़ जैसी मीठी सी रस्म का भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है। आधुनिकीकरण, शहरीकरण और बदलते सामाजिक मूल्यों के कारण यह परंपरा मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित होती जा रही है। मटकोड़ ही नहीं बल्कि कई ऐसी रस्में हैं जो शहरी क्षेत्रों में जगह की कमी, व्यस्त जीवनशैली और समय की कमी के कारण कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। लोग अब ऐसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता ज्यादा देते हैं जो सुविधाजनक और सरल हों। लेकिन मटकोड़ रस्म न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि सामाजिक बंधनों को मजबूत करने और नए जीवन की शुभ शुरुआत का प्रतीक भी है। इसलिए नई पीढ़ी को इस रस्म के सांस्कृतिक, सामाजिक और प्रतीकात्मक महत्व के बारे में बताना जरूरी है। जिससे इस रस्म को विलुप्त होने से बचाया जा सके।
