Masik Karthigai Katha In Hindi: हर महीने मासिक कार्तिगाई का पर्व मनाया जाता है। ज्योतिष गणना के अनुसार, जिस दिन आसमान में चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में होता है, उसी दिन मासिक कार्तिगाई मनाई जाती है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय जी की विशेष रूप से पूजा की जाती है। दीपदान किया जाता है। साथ ही कुछ लोग व्रत रखते हैं। मान्यता है कि मासिक कार्तिगाई के दिन पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा, भय, घर में अशांति, खराब सेहत और शत्रु आदि से छुटकारा मिलता है।
मासिक कार्तिगाई के दिन जरूर करें इस कथा का पाठ
जो लोग मासिक कार्तिगाई के दिन भगवान कार्तिकेय जी को खुश करने के लिए उपवास रखते हैं, उन्हें व्रत की कथा भी पढ़नी चाहिए। इसके बिना व्रत को अधूरा माना जाता है। चलिए अब जानें मासिक कार्तिगाई व्रत की कथा के बारे में।
मासिक कार्तिगाई व्रत की कथा
बता दें कि मासिक कार्तिगाई के दिन से जुड़ी कई कथाओं का वर्णन पौराणिक शास्त्रों में किया गया है, जिसमें से दो सबसे प्रचलित कथाएं यहां दी गई हैं।पहली कथा-
भगवान कार्तिकेय को 6 कृतिका नक्षत्रों की देवियों ने 6 अलग-अलग शिशुओं के रूप में पाला था। इन 6 रूपों को माता पार्वती ने एक सुंदर बालक के रूप में बदला, जिसे मुरुगन नाम दिया गया। मुरुगन देव को शक्ति और विजय का देवता माना जाता है, जिनका एक नाम भगवान कार्तिकेय भी है। जिस दिन ये विशेष घटना घटी थी, उस दिन वैकासी विशाखम का पर्व मनाया जाता है। वहीं, छह कृतिका माताओं के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए हर महीने कृतिका नक्षत्र के दिन मासिक कार्तिगाई का व्रत रखा जाता है।दूसरी कथा-
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। सृष्टि की रचना के कुछ समय बाद ही ब्रह्मा जी और जगत के पालनहार विष्णु जी के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद छिड़ गया। दोनों के बीच का विवाद खत्म ही नहीं हो रहा था, जिसके कारण अन्य देवतागण भी परेशान थे। विवाद को खत्म करने के लिए भगवान शिव अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और आकाशवाणी हुई कि 'आप दोनों में से जो भी इस ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत ढूंढ लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा।इसके बाद विष्णु जी ने वराह अवतार लिया और पाताल लोक जाकर ज्योतिर्लिंग का आदि-अंत ढूंढने का प्रयास किया। वहीं, दूसरी तरफ ब्रह्मा जी हंस रूप में आकाश की ऊंचाइयों में उड़ते गए। कहा जाता है कि ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने कई युगों तक प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
आखिर में विष्णु जी ने अपनी हार स्वीकार कर ली, लेकिन ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से झूठी गवाही दिलाई कि उन्हें अंत मिल गया है। शिव जी को पता था कि ब्रह्मा जी झूठ बोल रहे हैं। जब ब्रह्मा जी ने सच नहीं बताया तो वो बहुत क्रोधित हुए और प्रचंड रूप धारण कर लिया, जिससे पूरी धरती में हाहाकार मच गया।
इसके बाद सभी देवताओं ने शिव जी से क्षमा याचना की, जिसके बाद उनकी ज्योति तिरुमल्लई पर्वत पर अरुणाचलेश्वर लिंग के रूप में स्थापित हुई। बता दें कि इस कथा से कार्तिगाई दीपम दीपों का महत्व जुड़ा है, जिसे शिव जी की अनंत ज्योति का प्रतीक माना जाता है।
