शनिदेव को ज्योतिष शास्त्र में कर्मफलदाता, न्यायधीश और कलयुग का दंडाधिकारी कहा जाता है। शनि के मित्र ग्रह शुक्र, राहु और केतु होते हैं। मंगल ग्रह को ग्रहों का सेनापति कहा जाता है। मंगल का संबंध साहस, पराक्रम और ऊर्जा से होता है। मंगल के मित्र ग्रह सूर्य, गुरु और केतु हैं। जानिए इन दोनों ग्रहों के आपस में कैसे संबंध हैं?
मंगल और शनि के आपस में कैसे संबंध हैं?
क्या मंगल और शनि शत्रु हैं ?
लाल किताब के अनुसार बुध, केतु मंगल के शत्रु माने जाते हैं, वहीं सूर्य , चंद्रमा और मंगल शनि के शत्रु माने जाते हैं। मंगल और शनि समभाव में है परंतु मंगल शनि से शत्रुता रखता है।
मंगल और शनि का संबंध
कुंडली में मंगल और शनि के बीच 3 तरह से संबंध बनता है। जिसे युति संबंध , दृष्टि संबंध और राशि परिवर्तन कहते हैं। इसका अलग अलग प्रभाव पड़ता है ।
युति संबंध
जब शनि और मंगल किसी भाव या राशि में एक साथ विराजमान होते हैं तो युति संबंध बनता है। अगर आपकी कुंडली में युति संबंध बना है तो आपके सभी अच्छे कार्य बुरे में बदल जाएंगे। यह संबंध आपके लिए द्वंद योग का निर्माण करता है।
दृष्टि संबंध
जब शनि और मंगल एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तो दृष्टि संबंध बनता है। दृष्टि संबंध आपदाओं का कारण होता है। यह विध्वंसक योग बनाता है। ऐसे में ये दोनों मिलकर क्रूरता का निर्माण करते हैं।
राशि परिवर्तन संबंध
जब मंगल और शनि एक दूसरे की राशि में गोचर करते है तो उसे राशि परिवर्तन कहते हैं। इसमें यह दोनों एक दूसरे के मित्र होकर लाभ पहुंचाते हैं।
पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यता अनुसार शनिदेव ने भगवान शिवजी की तपस्या करके ग्रहों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था और मंगल को सभी देवताओं का सेनापति माना जाता है ।
शनि-मंगल के प्रभाव से बचने के उपाय
शनि और मंगल के प्रभाव से बचने के लिए मंगलदेव की पूजा करनी चाहिए। मंगल की कृपा से शनि और मंगल के सारे दोष दूर होते हैं।
