March 2026 vivah muhurat (2026 में मार्च की शादी डेट्स): हिंदू परंपरा में शुभ विवाह ने केवल दो आत्माओं का मिलन होता है, बल्कि इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित तमाम देवताओं के आशीर्वाद से नई यात्रा की शुरुआत भी मानी जाती है। यही वजह है कि विवाह हमेशा शुभ मुहूर्त देखकर ही किया जाता है। मुहूर्त वह समय होता है, जब ग्रह, नक्षत्र, तिथि और वार मिलकर बंधन को सौभाग्य और समृद्धि से भर देते हैं। अगर आप मार्च 2026 में अपने जीवन साथी के साथ विवाह बंधन में बंधने की सोच रहे हैं, तो यहां मार्च 2026 के शुभ विवाह मुहूर्त देख सकते हैं।
2026 में मार्च की शादी डेट्स (Pic: Canva)
मार्च 2026 में शुभ विवाह मुहूर्त
मार्च 2026 में हिंदू पंचांग के अनुसार कुल आठ शुभ विवाह तिथियां उपलब्ध हैं, जिनमें ग्रहों का योग और नक्षत्र की स्थिति विशेष रूप से अनुकूल मानी जाती है। माना जाता है कि इन अवसरों पर विवाह संस्कार सम्पन्न करने से दांपत्य जीवन में प्रेम, सामंजस्य, और स्थायित्व की संभावनाएं बढ़ती हैं। ऐसे में ये तारीखें मार्च 2026 में शादी के लिए उपयुक्त मानी जा रही हैं -
- 2 मार्च 2026 (सोमवार): दो शुभ समय उपलब्ध, मध्याह्न के बाद से शाम तक अनुकूल मुहूर्त
- 3 मार्च 2026 (मंगलवार): सुबह का सांस्कृतिक समय उपयुक्त
- 4 मार्च 2026 (बुधवार): प्रातःकालीन शुभ समय
- 7 मार्च 2026 (शनिवार) से 8 मार्च 2026 (रविवार): स्वाति नक्षत्र में शुभ मुहूर्त
- 9 मार्च 2026 (सोमवार): शाम का समय अनुकूल
- 11 और 12 मार्च 2026 (बुधवार–गुरुवार): सुबह के शुरुआती समय में विवाह के लिए विशेष शुभ योग
शादी के लिए मुहूर्त का क्या महत्व होता है
हिंदू धर्म में मुहूर्त केवल तारीख नहीं होती बल्कि यह जीवन के अगले चरण के लिए आकाशीय संकेत और शुभ ग्रहों का संयोजन है। शास्त्रों के अनुसार शुभ समय में पिरोई गई कड़ी जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, सामंजस्य और दीर्घकालिक खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करती है। यही कारण है कि पुराने समय से परिवारजन, पंडित या ज्योतिषाचार्य मुहूर्त का अध्ययन कर विवाह का आयोजन तय करते आए हैं।
15 मार्च से शुरू होगा खरमास
ध्यान रहे कि 15 मार्च 2026 से सूर्य के गोचर के कारण खरमास आरंभ हो जाएगा। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को टाल दिया जाता है। खरमास लगभग एक माह तक चलता है और इसके दौरान शुभ कार्यों से परहेज बेहतर माना जाता है।
क्या होलाष्टक में विवाह हो सकते हैं
फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। मान्यता है कि इन दिनों ग्रहों की स्थिति अस्थिर रहती है और वातावरण में उग्रता का भाव होता है। इसलिए पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य करने से परहेज किया जाता है। मार्च की 2 और 3 तारीख होलाष्टक की अवधि में आती हैं।
सामान्य परंपरा के अनुसार देखें तो होलाष्टक में शादी नहीं की जा सकती है। उत्तर भारत, खासकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली क्षेत्र में होलाष्टक के दौरान शादी-ब्याह नहीं किए जाते। हालांकि इसे पूरी तरह निषेध नहीं माना गया है। कुछ ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि यदि बहुत विशेष परिस्थितियां हों, या कुंडली के अनुसार अत्यंत शुभ योग बन रहा हो, तो विधिवत शांति पूजन करवाकर विवाह किया जा सकता है।
वहीं दक्षिण भारत में होलाष्टक की मान्यता उतनी प्रचलित नहीं है, वहां इस अवधि में विवाह होते भी देखे जाते हैं।
