अहिंसा और सत्य का मार्ग दिखाने वाले महावीर स्वामी की जयंती का अपना ही एक महत्व है। जैन धर्म के 24वें तीर्थकार स्वामी महावीर को जैन धर्म के 24 वें तीर्थकार के रूप में माना जाता है। भगवान महावीर का जन्म लगभग 600 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन हुआ था। इस बार 31 मार्च को महावीर जयंती मनाई जाएगी। महावीर हमेशा सत्य, अंहिसा के पथ में चलने के लिए कहते थे। आइये यहां हम आपको महावीर स्वामी के बारे में विस्तार से बताते हैं।
भगवान महावीर कौन थे?
भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे। उनका जन्म ईसा पूर्व 599 वर्ष माना जाता है। उनके पिता राजा सिद्धार्थ और माता रानी त्रिशला थीं और बचपन में उनका नाम वर्द्धमान था।
महावीर स्वामी का जीवन परिचय-
महावीर स्वामी का जन्म एक राजघराने में हुआ था, लेकिन बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्म की ओर था। उनका प्रारंभिक नाम वर्धमान था। उन्होंने लगभग 30 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया और संन्यास ग्रहण किया। इसके बाद उन्होंने करीब 12 वर्षों तक कठोर तपस्या और मौन साधना की।
कठिन साधना के बाद उन्होंने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त किया और उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके साहस, धैर्य और अहिंसक स्वभाव के कारण ही उन्हें महावीर कहा गया। उन्होंने लगभग 72 वर्ष की आयु में पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया। उनका जीवन त्याग, संयम और आत्मअनुशासन का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
जैन धर्म में तीर्थंकर कौन होते हैं?
जैन धर्म के अनुसार तीर्थंकर वे महान आत्माएं होती हैं, जो सही ज्ञान, सही दृष्टि और सही आचरण के माध्यम से अपने आत्मा को पूरी तरह शुद्ध कर लेती हैं और सर्वज्ञता प्राप्त करती हैं। इसके बाद वे संसार के लोगों को धर्म और मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। तीर्थंकर शब्द का अर्थ ही होता है- धर्म का मार्ग बनाने वाला। ऐसे महान संत समाज को सही दिशा देते हैं और लोगों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने का रास्ता बताते हैं।
महावीर स्वामी के सिद्धांत क्या थे?
अहिंसा- महावीर स्वामी का सबसे प्रमुख सिद्धांत है। इसके अनुसार, किसी भी प्राणी को मन, वचन या कर्म से कष्ट न पहुँचाना सर्वोच्च धर्म है।
सत्य- हमेशा सच बोलना और सत्य के मार्ग पर चलना, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
अस्तेय- अचौर्य यानी जो वस्तु स्वेच्छा से न दी गई हो, उसे न लेना।
ब्रह्मचर्य- अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना तथा वासनाओं से दूर रहना।
अपरिग्रह- आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना और सांसारिक मोह-माया का त्याग करना।
अनेकांतवाद- यह सिद्धांत बताता है कि सत्य एक नहीं, बल्कि अनेक दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है, जो सहिष्णुता और संवाद को बढ़ावा देता है।
आत्मवाद- महावीर स्वामी के अनुसार, प्रत्येक जीव सर्वोच्च है और अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है।
