महाशिवरात्रि पूजा के 4 सबसे शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र, कथा सबकुछ जानें यहां
महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के भक्तों के लिए बेहद खास होता है। क्योंकि ये दिन शिव की अराधना का सबसे बड़ा दिन होता है। कहते हैं शिव और शक्ति के मिलन की इस पवित्र शिवरात्रि पर जो भी सच्चे मन से शिव भक्ति करता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। साल 2023 की महाशिवरात्रि बेहद ही खास होने वाली है क्योंकि इस साल महाशिवरात्रि और प्रदोष व्रत एक साथ पड़ रहे हैं।
Maha Shivratri 2023 Vrat Katha in Hindi: Read Here
शिव पुराण में महाशिवरात्रि का महत्व: शिव महापुराण में कोटिरुद्र संहिता के मुताबिक महाशिवरात्रि व्रत बेहद खास होता है। इस व्रत को करने से भक्तों को भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। इस व्रत को चार संकल्पों के साथ करना चाहिए। यह संकल्प इस प्रकार हैं:
-महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ की पूजा-अर्चना।
-रुद्र मंत्र का नियम अनुसार जाप।
-शिव मंदिर में पूजा करें और इस दिन व्रत रखें।
-काशी में देह त्याग करना।
Rudrabhishek Vidhi and Mantra in Hindi
शिवरात्रि पर कैसे करें पूजा? शिव पुराण के अनुसार इस दिन सुबह उठकर सबसे पहले स्नान करना चाहिए। इसके बाद माथे पर भस्म लगानी चाहिए। इसके बाद रुद्राक्ष की माला धारण करें और मंदिर जाएं। इस दिन शिवलिंग का अभिषेक करने का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए घर पर या मंदिर में जाकर शिवलिंग पर दूध या जल जरूर अर्पित करें।
कैसे करें शिवलिंग का रुद्राभिषेक?
-शिवलिंग का अभिषेक करते समय आपका मुख पूर्व दिशा में होना चाहिए।
-सबसे पहले गंगाजल शिवलिंग पर अर्पित करें। अभिषेक करते समय भगवान शिव के मंत्रों का जाप करना चाहिए।
-अभिषेक के दौरान महामृत्युंजय मंत्र, रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र, रुद्र मंत्र का जाप कर सकते हैं।
-गंगाजल के बाद शिवलिंग पर गन्ने का रस, शहद, दूध, दही जैसी वस्तुएं चढ़ाएं।
-फिर शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाएं।
-इसके बाद आप शिवलिंग पर बेलपत्र, भांग, धतूरा आदि शिव की प्रिय चीजें चढ़ाएं।
Shiv Chalisa Lyrics in Hindi
इस खास ब्लॉग में आप जानेंगे महाशिवरात्रि से जुड़े हर अहम पहलू के बारे में। जैसे महादेव की पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त, शिव पुराण में महाशिवरात्रि का महत्व, महाशिवरात्रि के दिन रुद्राक्ष धारण करने के अनोखे फायदे, महाशिवरात्रि व्रत कथा, शिव आरती, शिव चालीसा, रुद्राभिषेक के नियम और फायदे सबकुछ।
शिव चालीसा Shiv Chalisa
जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4
मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8
देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20
एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥
मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28
धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32
नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36
पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥
Maha Shivratri Vrat Paran Vidhi महा शिवरात्रि व्रत पारण विधि
महाशिवरात्रि व्रत का पारण नियम अनुसार करना चाहिए। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराकर “ऊं नमो नम: शिवाय” मंत्र का जाप करना चाहिए। इसके बाद रात्रि के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करें फिर अगले दिन प्रात: काल स्नान करके शिव की पूजा करें और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए।
Mahashivratri Vrat Paran Muhurat 2023
शिवजी की आरती : ॐ जय शिव ओंकारा Shiv Aarti
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव...॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव...॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव...॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव...॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव...॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता ।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ ॐ जय शिव...॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव...॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी ।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव...॥
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय शिव...॥
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Maha Shivratri 2023- महाशिवरात्रि व्रत कथा
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Maha Shivratri 2023- रुद्राक्ष धारण करने के फायदे
Shri Rudrashtakam Lyrics: श्री शिव रुद्राष्टकम
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम् ॥
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम् ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥
चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥
प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम् ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम् ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥
रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।
इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥
