Jagannath Temple: नवकलेवर के दौरान क्यों कांप जाते हैं पुजारियों के हाथ? जानिए भगवान जगन्नाथ के 'ब्रह्म पदार्थ' का रहस्य

Jagannath Temple: ओडिशा के पुरी जगन्नाथ मंदिर में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। जिसे करते हुए पुजारी के हाथ भी कांप जाते हैं। नवकलेवर के दौरान होने वाली इस परंपरा के रहस्य के बारे में जानते हैं।

Jagannath Temple: हर 8, 12 या 19 साल में एक ऐसा क्षण आता है, जब पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर दुनिया की सबसे रहस्यमयी धार्मिक परंपराओं में से एक का साक्षी बनता है। इसे नवकलेवर (Navakalevara) कहा जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की पुरानी काष्ठ प्रतिमाओं का स्थान नई प्रतिमाएं लेती हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गोपनीय चरण 'ब्रह्म पदार्थ' का स्थानांतरण है। जी हां ये एक एक ऐसा अनुष्ठान है जिसे देखने की अनुमति किसी को नहीं होती और जिसके बारे में मंदिर परंपरा आज भी मौन है। यही कारण है कि वर्षों से यह सवाल लोगों के मन में बना रहता है- आखिर इस अनुष्ठान के दौरान पुजारियों की आंखों पर पट्टी क्यों बांधी जाती है और इसे इतना गोपनीय क्यों रखा जाता है? आइए जानते हैं क्या है भगवान जगन्नाथ से जुड़ी से अनोखी परंपरा जिसे निभाते हुए पुजारियों के भी हाथ कांपने लगते हैं।

Jagannath Temple

पुरी जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा रहस्य

कहां मिलता है नवकलेवर का पहला उल्लेख

जानकारों की मानें तो नवकलेवर की परंपरा का उल्लेख पुरी मंदिर के पारंपरिक इतिहास ग्रंथ मादला पांजी (Madala Panji) में मिलता है। इसके अलावा मंदिर की Record of Rights और ओडिशा की वैष्णव परंपराओं में भी इस अनुष्ठान का विस्तृत वर्णन मिलता है। हालांकि ब्रह्म पदार्थ की वास्तविक प्रकृति के बारे में इन स्रोतों में भी स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता रहस्य को परंपरा का हिस्सा बनाए रखना है।

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